साहित्य

नई बेला है (नववर्ष विशेष कविता)

सुनील कुमार महला

नई बेला है, खुशगवार पवन में,

मन के पंछी उड़ता जा

आशा की पगडंडी पर तू, सपनों के दीप जलाता जा।

नव-रश्मियां सूरज की आकर,

हर आंगन उजियारा दें

थकी हुई आंखों में फिर से, विश्वास नया भर जाए।

खेत-खलिहान हरे-भरे हैं,

धरती गीत सुनाती है

माटी की गोद में पलकर, जीवन राह सिखाती है।

नव उत्कर्ष, नव उत्साह संग,

नव संकल्प को साधे चल

दिल न तू किसी का दुखा, बस प्रेम का संदेशा चल।

ओस की बूंदें कहती हैं,

कोमलता में बल होता

पंछी गाएं, नभ मुस्काए, हर क्षण उत्सव होता।

कुदरत की नैमत बहती है,

तू भी संग-संग बहता जा

कोई न भूखा, कोई न दुखी, यह सपना सच करता जा।

हिल-मिल सब रंगोली बनें,

रंग-बिरंगा जीवन हो

नदियां, पर्वत, वन-जंतु संग, संतुलन का आचरण हो।

नई बेला है,

खुशगवार पवन में, मन के पंछी उड़ता जा

दीप जला, खुशियां बिखरा, मानवता गुन गाता जा।

 

सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड

मोबाइल 9828108858

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