साहित्य

नहीं काम आई

रामकृष्ण वि सहस्रबुद्धे

नहीं काम आई किसी के विरासत
असंतोष फूटा हुई है बगावत l

पसीने से तर थे बदन देख सारे
हुई धूप जब तो मिली आज राहत l

अजब या गजब का मनुज का चलन है
बढ़ी देख जब से नई सी सियासत l

जमाना हमारा नवा हो रहा है
नहीं माँगता अब किसी से रियायत l

भले या बुरे का नहीं भान जिसको
वही कर रहा है सभी से अदावत l

महज चार सिक्के लगा है बचाने
समझने लगा है उसी को किफायत l

उनींदी हुई आँख जब भी हमारी
खुली छत के नीचे बिछायी बिछायत l

रामकृष्ण वि सहस्रबुद्धे

नागपुर

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