
चक्रवर्ती राजा दशरथ जनक पुरी
जब श्री राम व भाइयों की बारात
लेकर महाराज जनक के द्वार पहुँचे
तो उन्होंने जनकजी के पैर छूने चाहे।
महाराज जनक चौंके और दशरथ जी,
के हाथ थामकर विनम्रतापूर्वक बोले,
राजन वरपक्ष के हैं, बड़े हैं आप हमसे
इस तरह से उल्टी गंगा क्यों बहा रहे हैं।
राजा दशरथ ने बड़ा सुंदर जवाब दिया,
कि महाराज आप बड़े हैं आप दाता हैं,
आप कन्यादान महादान कर रहे हैं,
मैं याचक हूँ कन्यादान लेने आया हूँ।
आप ही बताइये महाराज जनक जी
कि दाता और याचक में कौन बड़ा है,
जनक जी के नेत्रों में अश्रुधारा बह चली,
धन्य हैं वे माता पिता जिनके घर है बेटी।
भाग्यशाली होते हैं राजा जनक जैसे
पिता और दशरथ जैसे उनके समधी,
भाग्यशाली है वो सभी माता व पिता
जिनके घर जन्म लेती है प्यारी बेटी।
वैसे तो कहा जाता है कि कन्या कोई
वस्तु नहीं है जिसका दान किया जाये,
पर कन्यादान की संज्ञा धर्मसम्मत है
इस पुण्य को और क्या नाम दिया जाये?
धर्म क़र्म सदा आगे पीछे देखते हैं,
पर दुनिया सदा इधर-उधर देखती है,
विश्वास रखें, कन्यादान की ओर देखें,
और इस पर सकारात्मक रूख अपनायें।
माता पिता की प्यारी बेटी जब किसी,
वर को विवाह करके दे दी जाती है,
आदित्य संसार की वंश वृद्धि इस
पुण्यदान से ही सम्भव हो पाती है।
विद्यावाचस्पति डॉ कर्नल
आदिशंकर मिश्र, ‘आदित्य’
लखनऊ



