साहित्य

परोपकार का दीप

डाॅ सुमन मेहरोत्रा

परोपकार वह दीप है, जो अंधियारे हर ले जाए,
स्वार्थ की ठंडी रातों में, मानवता को जगमगाए।
दुखियों के आँसू पोंछ सके, वही सच्चा इंसान,
अपना सुख जो बाँट सके, वही पाए सम्मान।

काँटों भरी राहों में भी, जो फूल बिछा जाए,
बिन कहे, बिन चाहे कुछ, सेवा पथ अपनाए।
भूखे को जो रोटी दे दे, नंगे को वस्त्र पहनाए,
उसके छोटे से कर्म से, ईश्वर भी मुस्काए।

परोपकार न धन से मापा, न ऊँचे अभिमान,
यह तो करुणा की भाषा है, प्रेम भरा विधान।
गिरते को जो थाम सके, टूटे मन को जोड़ दे,
अंधेरे में आशा का, दीपक फिर से छोड़ दे।

स्वयं जलकर जो उजियारा, जग में बाँट जाए,
परोपकार वही जीवन है, जो मरकर भी अमर हो जाए।
निस्वार्थ भाव से किया गया, हर छोटा सा उपकार,
युगों-युगों तक गूँजता है, बनकर जीवन का आधार।

डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार

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