साहित्य समाचार

प्रयागराज के कवि जयचन्द प्रजापति ‘जय’ की बाल साहित्य, काव्य व व्यंग्य रचनायें साहित्य जगत में छाईं

प्रयागराज, 29 दिसंबर 2025 (दि ग्राम टूडे)

प्रयागराज के बहुमुखी साहित्यकार जयचन्द प्रजापति ‘जय’ की बाल साहित्य और व्यंग्य रचनाएं सरल भाषा में सामाजिक संवेदना, हास्य व शिक्षा का अनूठा संगम रचती हैं। गरीबी, श्रम व लोक जीवन पर केंद्रित ये रचनाएं हिंदी साहित्य को नई दिशा दे रही हैं।

प्रजापतिजी की बाल कविताएं प्रकृति, जानवरों व दैनिक जीवन से जुड़कर नैतिक मूल्य सिखाती हैं। “चाचा नेहरू” में नेहरूजी के बाल प्रेम को सरल पंक्तियों—”चाचा नेहरू सबको अच्छे लगते हैं, बच्चे उनको चाचा नेहरू कहते हैं”—से चित्रित कर देशभक्ति जगाई गई है। “बंदर मामा”, “चीकू-मीकू”, “काला चींटा” चींटी की मेहनत व मूली-बैंगन के खेल से हास्यपूर्ण शिक्षा देती हैं, जबकि “जाड़ा आया” व “चूहा बेचारा” मौसम व कमजोरी पर मार्मिक चित्रण प्रस्तुत करती हैं।

व्यंग्य रचनाओं में जय न्यायपालिका, फुटपाथवासियों व आधुनिकता पर कटाक्ष करते हैं। “एक उदास जज” में—”मेरा न्याय अपंग सा हो गया है”—न्याय की लाचारी उजागर हुई। “हम फुटपाथ के आदमी हैं”, “कवयित्री के अंधभक्त” व “वह मजदूर” में—”रोज खाता हूं धक्के”—ट्रेन-जैसे जीवन का दर्द हास्य से व्यक्त किया गया। बोलचाल भाषा पाठक को हंसाते हुए सोचने को मजबूर करती है।

शैलीगत खासियतें व लोकभाषा का प्रभाव बाल साहित्य में लयबद्ध सरलता व व्यंग्य में दोहराव-संवाद प्रमुख हैं। प्रयागराज की लोकभाषा “पूस की रात” की गरीबी संवेदना से जुड़कर इन्हें विशिष्ट बनाती हैं। साहित्य प्रेमी इन रचनाओं से हिंदी साहित्य की समृद्धि का अनुभव करेंगे।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!