आलेख

रैगिंग

वीणा गुप्त

सुबह के मौसम में मीठी-मीठी खुशनुमा सी ठंडक थी। आसमान में  हल्के बादल  बारिश की संभावना दर्शा रहे थे। बंगलौर के इस कॉलेज में आज से नए सत्र का  प्रारंभ हो रहा था। अवनी बडे़ बुझे मन से हॉस्टल से  निकली।
उसकी उदासी के कई कारण थे पहली बार घर से  दूर आई थी। और इस शहर में उसे जानने-
पहचानने वाला भी कोई नहीं  था। वैसे घर में कोई नहीं चाहता था कि वह यहाँ आए। मगर वह ही अपने पसंद के विषय को लेकर अड़ गई  थी। उसे जर्नलिज्म में रूचि थी। अंग्रेजी और हिंदी भाषाओं पर उसका अच्छा अधिकार  था। करेंट ईवेंट्स और देश- दुनिया की पूरी जानकारी थी। उसकी जिज्ञासा ,तर्कशक्ति और साहस भी कमाल का था। किसी भी सिचुएशन का हल्के- फुलके अंदाज़ में समाधान निकाल लेना’ उसके बाएँ हाथ का खेल  था। लेकिन उसकी एक बहुत बड़ी कमी ,उसके इस करियर के आड़े आती थी। उसे बाहर  निकल कर घूमना बिल्कुल  पसंद नहीं  था। वह सुविधाजीवी  थी। उसका दो साल छोटा भाई नभ, इसी बात को लेकर उसका मजाक उड़ाता।
” हुँह ,ये बनेंगी पत्रकार  घर बैठे-बैठे। दुनिया की पहली घर घुसरी पत्रकार होने का अवार्ड तो हमारी अवनी दी को ही मिलेगा।”
और फिर घर में  जो चिल्ल- पों मचती,उससे दादी का टैम्परेचर थर्मामीटर तोड़ कर बाहर निकल आता,
” अरे इतने बड़े धींगड़े हो गए ,यूँ कुत्ते -बिल्लियों  की तरह झगड़ रहे हो।”
नभ ,कुत्ते से की गई अपनी  तुलना को सिरे से नज़र अंदाज़ अ
करता और अवनी को चिढ़ाता,
” पूसी दी ,बोलो म्याऊँ म्याऊँ। ”
अवनी उसे मारने  दौड़ती।
जब उसे अपने शहर में इस विषय में, किसी अच्छी जगह  एडमिशन नहीं  मिल पाया ,तो उसने यहाँ आने  का निर्णय लिया। मम्मी- पापा ने सोचा कुछ दिनों  में  खुद ही हथियार डाल देगी ।अभी मना करेंगे तो और ज़िद पर उतर आएगी। इसलिए  चुप लगा गए। अवनी का मन भी डावांडोल  सा था । नभ जरूर उसे हर समय खिझाता ,”पैकिंग- वैंकिंग हो गई  न दी।”
नभ की इसी हरकत ने  उसके इरादे को अनजाने  ही ऐसी हिम्मत दी कि वह  सबकी आशा के विपरीत, पढाई करने बंगलौर आ ही गई और अब उसे  यहाँ बहुत अकेला  लग रहा था। बेमन से अवनी रूम से निकली और कॉलेज की ओर बढ़ी। कॉलिज  परिसर में  घुसते ही उसे एक अजीब सा मंज़र नजर आया।
एक कुछ ज्यादा ही साँवली,
लगभग साढ़े पाँच फुटी, एक हट्टी- कट्टी लड़की को चार लड़कियों ने घेरा हुआ था और उसे परेशान कर रहीं थीं।
“अच्छा तो  यहाँ रैगिंग चल रही है।” अवनी को सहसा ही ध्यान आया और साथ ही उसने हल्का सा नर्वस  फील किया।
“वह भी तो फ्रैशर है । कहीं उसकी भी—–। ”
इसी समय उसे एक लडकी की आवाज़  सुनाई दी जो उस फ्रैशर को कुछ आदेश दे रही थी। बाकी लड़कियाँ  सिचुएशन एन्जॉय कर रही थीं। अवनी सब भूल- भाल कर’ उनके बिल्कुल पास आ खड़ी हुई। ये चार मरियल सी लड़कियाँ  उस भीमकाय लड़की  पर भारी पड़ रही थीं। अवनी को देखकर चारों  अब उसे  ही हैरानी  से देख  रही थीं ।
“लग तो यह भी फ्रैशर ही रही है ,पर इसकी इतनी मजाल। हमारे पास ही आकर खड़ी हो गई ” एक सीनियर ने दूसरी से धीरे से कहा।
उनकी खुसुर- फुसुर और शारीरिक मुद्राओं से साफ था कि उन्हें अवनी की हिमाकत बिल्कुल  पसंद नहीं  आई थी और वह उसे भी  इसका मजा़ चखाना चाह रही थीं। अवनी ने उनको उपेक्षा से देखा और उनके शिकार की ओर  ध्यान दिया। पीड़िता बहुत  नर्वस थी। उसकी आँखों में आंँसू थे। अपमान और  गुस्से  के मारे उसके होंठ बुरी तरह फड़क रहे थे। वह कुछ  कहना चाहती थी पर बोल नहीं  पा रही थी।
“अरी कोयल अब कुछ बोल भी दे , या यूँ ही होंठ हिलाती रहेगी।”
उसके गहरे रंग पर कटाक्ष करती,
एक लड़की बहुत बदत़मीजी से बोली।  “और हाँ, तू भी आ जा लाईन में।”  उन चारों की मुखिया अवनी से बोली। “अवनी ने देखा यह लड़की  भैंगी थी और ओवर कॉन्फिडेंट भी थी। एक लड़की  के पास बहुत से सैश थे। उसने  मिस ब्यूटी क्वीन का सैश निकाला और उस सांवली लड़की  के गले में  डाल दिया । सभी लड़कियांँ जोर से  हँसी। “अब ज़रा कैट वॉक भी हो जाए  दो- चार स्टैप।”  भैंगी ने  उस साँवली लड़की को आगे  धकेला। तथाकथित ब्यूटी क्वीन गुस्से  से काँप उठी। उसके आँसू गालों पर बह आए।
“अरी अब चल ना”
भैंगी ने फिर आदेश किया।
अब अवनी अपने  को रोक नहीं  पाई और आगे बढ़कर  सैश उसके गले से निकाला। उसके  चार दुकडे़  किए और  उन लड़कियों  के  मुँह पर दे मारा।  चारों को अपनी आँखों पर विश्वास  नही हुआ। अभी -अभी आई  है इस कॉलेज में और हम से  पंगा।  पहले इससे  ही निपट लेते हैं। चारों बिफरती हुई अवनी पर झपटीं।
“ज़रूर,आजा एल.एल .
टी .टी.। “अवनी ने कराटे की मुद्रा में अपने हाथ उठा कर उन्हें ललकारा।
” यह एल. एल .टी .टी.क्या है?” भैंगी ने  पूछा।
“तेरा नया नाम करण । लुक लंदन  टॉक टोकियो। और क्या।” अवनी बोली।
” आया पसंद–?  और हाँ , तुझे तो मैं पहनाती हूँ मिस यूनीवर्स का सैश। अरे भई,क्या बाँकी नज़र पाई है। देना जरा मुझे यह सैश।” वह सैश वाली लड़की  से बोली। जो घटनाचक्र में आए परिवर्तन से  घबराई सी, सब  कुछ वहीं पटक कर पतली गली से भागने की फिराक में  थी। बाकियों की भी बोलती बंद थी। भैंगी का मुँह उतर गया था। चुपचाप आगे को खिसक ली। अवनी ने  आगे बढ़कर उसकी बाँह पकड़ ली।

“ऐसे कहाँ चलीं मैडम यूनीवर्स ? ज़रा दो चार कदम कैट वॉक,  मतलब बिल्ली- चाल तो चलकर दिखा दो हमें।”
” सॉरी सॉरी ” भैंगी पूर्व में देखती ,नॉर्थ में  बोली।
“नहीं  जी ,ऐसे कैसे ? रैंप पर दो चार ठुमके तो लगाने ही पड़ेंगे। प्लीज जूनियर की रिक्वेस्ट मान लो न। एल. एल. टी .टी मैडम। ” अवनी  ने विनय का ऐसा अभिनय किया कि सभी को, यहाँ तक कि पीड़िता लड़की को भी हँसी  आ गई। अब तक और भी  तमाशबीन इकट्ठे  होने लगे थे।
“जाने भी दो यार।” सैश वाली लड़की गिड़गिड़ाई।
“नो यार ,अब ओनली वार। हो ना तैयार? अवनी है मेरा नाम। अभी पूरे सीन की रिकार्डिग होगी। मुझे इसका वीडियो  बनाकर सोशल साईट पर डालना है। हमारी मिस यूनीवर्स के चर्चे भी तो बुलंद हों पूरी दुनिया में । हाँ तो डियर, हो जाओ स्टार्ट।”
अवनी ने  कैमरा संभाला । चारों लड़कियाँ फौरन वहाँ से भागीं। अवनी ने उन्हें वार्न किया ,” रुको, अब दुबारा ऐसा नहीं होना चाहिए। नहीं  तो–। ”
” थैंक्यू अवनी” पीडित लड़की अब नॉर्मल  हो चुकी  थी ।अवनी हँस दी।
“तुम बहुत बोल्ड हो।” वह बोली।

“तुम्हारा क्या नाम है। यहाँ किस सबजेक्ट में एडमिशन  लिया है। क्या तुम भी होस्टलर  हो।” अवनी ने पूछा।
“अरे बाबा! एक साथ  इतने प्रश्न। उत्तर तो सुन लो। मैं यामिनी हूँ। यामिनी सुंदरम । समाज शास्त्र में  हूँ। लोकल हूँ ।बंगलौर  में  ही अम्मा के साथ रहती हूँ। अप्पा नहीं  हैं। क्या तुम मेरी दोस्त  बनोगी।” यामिनी ने कहा।
अवनी को बहुत अच्छा  लगा। इतनी जल्दी  उसको एक दोस्त  भी मिल गई।  उसने अपने बारे में उसे बताया। धीरे -धीरे  वे बहुत  अच्छी सहेलियाँ बन गई। वीक एंड पर यामिनी उसे अपने घर बुलाती। अम्मा उसके लिए कोई न कोई  स्पेशल  डिश बनाती। कालेज में  भी दोनों खाली समय साथ ही बितातीं। यामिनी बहुत ही सुलझे विचारों वाली भावुक प्रवृत्ति  की लड़की  थी।अवनी गुस्से  वाली लेकिन साफ साफ बोलने वाली। एक दिन लंच में दोनों  कॉलिज कैंटीन मे बैठी कॉफी पी रही थीं कि अचानक ही अवनी की नज़र  भैंगी पर पड़ी, जो अकेली ही दोसा खा रही थी। अवनी को शरारत सूझी। “चल  यामिनी, आज इस भैंगी—। “”उसका नाम सुनयना है अवनी। तुम्हें  उसे इसी नाम से बुलाना चाहिए।” सुनयना  नाम सुन कर अवनी को हँसी आ गई।मजे में गाने लगी”  ये तिरछे-तिरछे नयना–। “अवनी तुम ऐसे करोगी तो मैं अभी यहाँ से  चली जाऊँगी।” यामिनी  ने  गुस्से  से कहा। “अरे भई माफ करो। अब से ऐसा कभी नहीं कहूँगी।” अवनी बोली। इसी समय  उन्होंने  देखा सुनयना उन्हीं  की ओर आ रही है।
” हैलो सुनयना दी।” अवनी  इतने  आदर से बोली कि यामिनी  को भी हँसी आ गई। तब तक सुनयना उनकी टेबिल पर आ बैठी  थी।  “कैसी हो तुम लोग?” उसने पूछा।
“अजी हम हैं  तो क्या गम है ”  बिंदास अवनी बोली। सुनयना न जाने  क्या सोच रही थी।
” आपको हमसे कुछ कहना हैं।”  यामिनी  ने पूछा। “हाँ ”
कहते हुए उसने  अपने  बैग से निकाल कर उसे एक  कार्ड दिया ।उस पर सॉरी लिखा था।  यामिनी  बहुत जल्दी पिघल जाती है।
“अरे नहीं  सुनयना दी, इसकी कोई जरूरत नहीं।  हम  तो  वह बात कब की भुला चुके हैं।”
“हम तो भूल गए  पर यह एल. एल. टी .टी .तो जन्म भर नहीं भूलेगी “अवनी सोच रही  थी।
” तो ठीक  है अब से मैं भी तुम्हारी  दोस्त हुई। ” वह चहकती सी बोली।  धीरे -धीरे  यह दोस्ती पक्की होती गई। सुनयना उतनी बुरी भी नहीं  थी ,जितनी वह पहले दिन लगी थी।
कॉलिज के दिन पँख लगाकर उड़ गए। सभी अपने -अपने करियर में अलग -अलग शहरों में  व्यस्त हो गए। शुरू में  तो वे एक दूसरे  को  नियमित कॉल करतीं। मैसेज भी भेजतीं। धीरे -धीरे सब छूट गया। हांँ, सुनयना की मैरिज का कार्ड आया था। बहुत चाहते हुए भी कार्य की व्यस्तता के चलते  नहीं जा  सकी। हाँ, एक बार यामिनी  से मिलने  का मौका मिला  था।  किसी ईवेंट की रिपोर्टिंग  के लिए बंगलौर गई  थी। वहीं समय निकाल  कर यामिनी  से  मिली। वहीं किसी स्कूल में  समाज शास्त्र पढ़ा रही थी। अपने  जीवन से  संतुष्ट  थी। “शादी वादी नहीं  करनी क्या? “अवनी ने उससे  पूछा था। “अब क्या शादी की उम्र  रह गई है मेरी। पैंतालीस की हो  गई हूँ।  अम्मा भी अकेली हैं। उनकी भी उमर हो रही है। अब बीमार भी रहने लगीं हैं।   हम  ही एक दूसरे  का सहारा हैं।”
” तू अपनी सुना ।कैसी चल रही है जिंदगी? ”
“बढ़िया है। बच्चों  को उनकी  दादी माँ के हवाले  कर गृहस्थी और नौकरी के बीच में सैंडविच हुए पडे़ हैं। ” कहते हुए उसने अपने परिवार  की कुछ पिक्स उसे दिखाईं। “हाय राम ! कित्ते प्यारे बच्चे  हैं तेरे। कभी फैमिली  के साथ कुछ दिन मेरे पास आकर रह न?  “यामिनी  आग्रह पूर्वक कहा। “आऊंँगी।” अवनी हँस दी ।सहसा ही कुछ याद करते हुए बोली. “हाँ ,अपनी भैंगी दी का कुछ अता पता–। ”
“तू कभी नहीं  सुधरेगी ।” यामिनी  ने नाराजगी जताई।
“सब मजे में  है। प्रेम विवाह किया है। लड़का अच्छी नौकरी में है। सब खुश हैं।” अवनी ने उससे सुनयना का फोन नंबर  ले लिया।

और फिर आज तीस बरस के अंतराल के बाद याद आ रही  है अवनी को उन दोनों  की। अब रिटायरमेंट के बाद फुरसत ही फुरसत है उसे। दोनों बच्चे  सैटल हैं । उसने अपने पति को बताया,” शशांक ,मैं सोच रही हूँ  एकाध हफ्ते का ट्रिप  लगा आऊँ बंगलौर का। “क्या फिर  कोई काम आ गया। अरे भाई , पूरी उम्र तो भटकने में  बिता दी। अब तो आराम से  बैठो। “शशांक बोला।” काम से नहीं , आराम करने जा रही हूँ।  जाऊँ ? ” उसने  पूछा।  शशांक हँस दिया।  उन दोनों  की,कैमेस्ट्री बहुत अच्छी  है। कोई टोका-टोकी नहीं।.कुछ भी करो कोई परेशानी नहीं।” सात- आठ दिन लग जाएँगे, मैं धरा को कह देती हूँ, यही तुम्हारे  पास आ जाएगी।” धरा उनकी विवाहिता  बेटी है, उनके घर के पास ही रहती है। “अरे, उसे क्यों परेशान  करती हो,मैं रह लूँगा। वैसे भी हर दूसरे दिन तो वह आती ही है मिलने।
वैसे जैसा तुम्हें  ठीक  लगे”
वह बोली।
अवनी ने अगली ही  मॉर्निंग की फ्लाईट ली और पहुंँच गई बंगलौर। यामिनी  से मिलने। उसे बिना बताए। करीब बारह  बजे  उसने  यामिनी  के घर की कॉल बैल  दबाई । वह बहुत  उत्साहित  थी पता नहीं  क्या रिएक्ट करेगी यामिनी, उसे  सहसा देख कर। काम वाली बाई ने दरवाजा  खोला। “यामिनी! “अवनी ने आवाज लगाई और फिर वहीं सोफे पर बैठ   गई। “इस समय कौन आया है अम्मा ?”  कहते हुए जिस प्रौढा़ ने  प्रवेश किया अवनि उसे देखकर हैरान  हो गई। वह उसे बिल्कुल नहीं  पहचान पाती पर उसकी तिरछी नज़रिया और बोलने के अंदाज़  ने उसकी पहचान  पूरी तरह उजागर कर दी।  “अरे एल. एल. टी .आई मीन सुनयना दी ,आप यहाँ पर? वाह  भई। यह तो आम के आम और गुठलियों के दाम वाली बात हो गई।” अवनी ने मुहावरे  की ऐसी कम तैसी करते हुए कहा। । “आम और  गुठली किसे कहा जा रहा है भई?” तभी कमरे में  अम्मा की सहायता से  प्रवेश करते हुए यामिनी  ने चिर परिचित  लहजे़ में  एतराज जताया। ” अवनी ने  देखा यामिनी दी की कमर झुक गई थी, वह वॉकर के सहारे  बहुत धीरे -धीरे चल रही थी। अवनी  भाव विह्वल  हो उठी। जाकर उसे गले  लगा लिया। “क्या हो गया हमारी ब्यूटी क्वीन को। ?”
‘सुनयना दी, आपने तो कोई हरकत नहीं की न?
नहीं तो याद है न आपको हमारी पहली मुलाकात।” उसने  कराटे की मुद्रा बनाई और हँस पड़ी।पर सुनयना  नहीं  हँसी, “बाबा ,इस बार मेंनै कुछ नहीं  किया यह  तो बुढ़ापे  की दहलीज  में   घुसने  पर  उमर ने हमारी रैगिंग कर दी है।” उसका स्वर गंभीर था और वह यामिनी को सँभाल कर कुरसी  पर बिठा रही थी।  यामिनी  काफी कमजोर और उदास लग रही थी। काम वाली  अम्मा चाय ले आई थी।   “तुम  बताओ यहाँ अचानक कैसे टपक पड़ीं।” अवनी ने वातावरण को हल्का बनाने की चेष्टा की। यामिनी  को कमजोरी लग रही थी।चाय पीकर वहीं लेट गई ।
सुनयना ने  बताया कि पिछले  चार बरस से वह  यामिनी  के साथ ही है। यामिनी  की अक्का का पंद्रह बरस पहले  निधन हो गया। तुम तो जानती हो यामिनी  उनकी  इकलौती  संतान है।
उसने जाने  के बाद यहाँ अकेली रह गई।जब तक नौकरी  करती रही तब तक सब ठीक चलता रहा। नोकरी के बाद भी एक साल  तो उसने  किसी तरह निकाल लिया। फिर उसकी  तबियत भी  ऐसी ही रहने लगी। तुम तो जानती हो न कि यामिनी  कितनी सैंसेटिव है और हमारी दुनिया कितनी कठोर।  पैसे की कोई कमी नहीं  है। अम्मा के जाने के बाद बहुत  से लोग अकेली समझकर उसके  पास शादी के लिए रिश्ता  ले  आए। मजे की बात यह कि जब अम्मा पूरे समय उसकी शादी का सपन देखती रही तब कोई रिश्ता  नहीं  आया।जो आया उसके  रंग- रूप को पसंद नहीं  कर पाया।वैसे भी हम रूप को देखते हैं, दिल को नहीं। अम्मा के जाते ही सबको बंगलौर का यह मकान नजर आने लगा। रिश्ते आने लगे। यामिनी  इस कड़वे सच को जानती थी। सभी को ठुकरा दिया। तब लोगों ने  प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष  रूप से  उसे  खूब सुनाया । यामिनी जबरदस्त डिप्रेशन में चली गई।सुनयना को पता चला तो वह यहांँ  आ गई।
“और सुनयना  दी, आपकी फैमिली।”
“मेरी फैमिली। दोनों  बच्चे  विदेश में और पति से तो बहुत पहले  ही तलाक हो  चुका था।”
“आपका तो प्रेम विवाह  था ना दी।”
” हाँ था तो प्रेम विवाह। पर विवाह के बाद प्रेम  छूमंतर हो गया।” वह बोली।
अब वह अकेली रह गई है । दोनों बच्चों की जिम्मेदारी से फुरसत पाकर, मकान को किराए पर देकर अब यहीं यामिनी  के  साथ रहने चली आईं।
” अब हम दोनों  एक दूसरे  का सहारा बनी जी रही हैं। अब इसकी हालत पहले  से अच्छी है।”
“तबियत अच्छी नहीं , बहुत अच्छी  है और वह भी सुनयना की कृपा से।”
यामिनी  सुनयना  को आभार भरी दृष्टि  से देख कर भीगे स्वर में  बोली।
“अच्छा जी ,और हमें  तो कोई क्रेडिट दे ही नहीं  रहा। कितना जोरदार सरप्राइज दिया है  तुम्हें? जंगल में  मंगल वाला। उसका क्या ? अब तो भई हमें जाना ही पड़ेगा।” अवनी ने झूठ- मूठ कर जाने के लिए  सामान उठाया।
” ऐसे कैसे चली जाओगी मैडम। तुम भी तो हमारी सेवा कर के कुछ पुण्य  कमा लो। ” यामिनी  बोली और फिर तीनों जोर से हँस दी। उन तीनों की उमर, उनकी रैंगिग का इरादा छोड़ चुपचाप एक ओर खिसक ली थी।

वीणा गुप्त
नई दिल्ली

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