
धर्म और राजनीति दोनों का ही मनुष्यों के जीवन तथा सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों के अवधारण में महनीय महत्त्व होता है।धर्म जहाँ मानव को नैतिकता आधारित जीवनमूल्यों को अंगीकृत करते हुए सच्चरित्र जीवन जीने की प्रेरणा देता है,वहीं राजनीति का परम ध्येय राष्ट्रनिर्माण और राष्ट्रीय चेतना का विकास करना होता था। किंतु दुर्भाग्यवश आज की सियासत जाति रूपी नैया में धर्म रूपी पतवार के सहारे चुनावरूपी वैतरणी पार करने का साधन बनती जा रही है। परिणामस्वरूप राजनीति लोककल्याण का माध्यम न रहकर निहित स्वार्थों की पूर्ति का औजार बन गई है और समाज में बढ़ता वैमनस्य राष्ट्रीयता के विकास में सबसे बड़ा बाधक सिद्ध हो रहा है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आज राष्ट्र के समक्ष उपस्थित सबसे गंभीर संकटों में जातीयता और धर्माधारित राजनीति प्रमुख है, जिसके लिए तथाकथित मजहबी नेता, उलेमा,भंते,पादरी,मिशनरियाँ,नव बौद्धिष्ट और आधुनिक राजनेता समान रूप से उत्तरदायी हैं।
जातीय विद्वेष की ऐतिहासिक विवेचना करने से स्पष्ट होता है कि ब्रिटिश काल में 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को कारतूसों में गाय और सुअर की चर्बी के प्रयोग से जोड़कर धार्मिक विद्रोह के रूप में प्रस्तुत किया गया था। वास्तव में यह अंग्रेजों की बांटो और राज करो नीति का हिस्सा था। मुगलकाल से लेकर औपनिवेशिक काल तक भारत की राजनीति किसी न किसी रूप में धर्म और जाति से प्रभावित अवश्य रही, किंतु 1947 का विभाजन धर्माधारित राजनीति का वह चरम और दुखद परिणाम था, जिसने भारत को स्थायी पीड़ा दी। यही कारण है कि संविधान-निर्माताओं ने प्रारंभिक प्रस्तावना में ‘सेकुलर’ शब्द का प्रयोग नहीं किया। इसे 42वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा आपातकाल के दौरान जोड़ा गया—यह तथ्य संवैधानिक इतिहास में दर्ज है।
समकालीन राजनीति का यथार्थ यह है कि चाहे कोई दल स्वयं को जितना भी धर्मनिरपेक्ष घोषित करे, चुनाव और टिकट वितरण तक जातिगत व धर्माधारित गणनाएँ निर्णायक बन चुकी हैं। अलग-अलग राजनीतिक दलों द्वारा विभिन्न जातियों और समुदायों का ध्रुवीकरण राष्ट्रीयता को भीतर से खोखला कर रहा है। सत्ता भले किसी को मिले, क्षति राष्ट्र और सामाजिक समरसता की ही होती है।
भारत में जातीय विद्वेषण के प्रथम उदाहरण के रूप में कोलकाता का दक्षिणेश्वर काली मंदिर भारतीय समन्वय चेतना का ऐतिहासिक प्रमाण माना जाता है।यह मंदिर भारतीय समाज के कर्मप्रधान और समन्वयी चरित्र का एक सशक्त ऐतिहासिक प्रमाण है। इस मंदिर का निर्माण सन् 1855 ई. में गंगा तट पर महान भक्त, समाजसेविका और दानवीरा रानी रासमणि द्वारा कराया गया। समकालीन जातीय वर्गीकरण की दृष्टि से रानी रासमणि उस समुदाय से थीं, जिसे आज की राजनीति ‘निम्न जाति’ कहती है। किंतु भारतीय सनातन परंपरा में भक्ति, आचरण और दान को ही श्रेष्ठता का मानदंड माना गया।मंदिर परिसर में माता काली के मुख्य मंदिर के साथ-साथ बारह शिव मंदिर तथा राधा-कृष्ण मंदिर स्थापित किए गए, जो स्वयं में शाक्त, शैव और वैष्णव परंपराओं के अद्भुत समन्वय का प्रतीक हैं। अंग्रेज शासकों ने इस अवसर को भी जातीय विद्वेष फैलाने के लिए प्रयोग करना चाहा। उन्होंने यह प्रचारित किया कि चूँकि मंदिर का निर्माण एक तथाकथित ‘निम्न जाति’ की स्त्री ने कराया है, अतः ब्राह्मणों को यहाँ पूजा नहीं करनी चाहिए।
ध्यातव्य है कि अंग्रेजों के इस विद्वेष फैलाने के कुचक्र को भारतीय समाज की आत्मा ने अस्वीकार कर दिया।अंग्रेजों के कुचक्र को असफल करने हेतु मंदिर के प्रथम पुजारी के रूप में रामकुमार चट्टोपाध्याय, जो जाति से ब्राह्मण थे, सहर्ष आगे आए। उनके निधन के पश्चात उनके अनुज गदाधर चट्टोपाध्याय, जिन्हें कालांतर में परमहंस स्वामी रामकृष्ण के नाम से जाना गया, प्रधान पुजारी बने।स्वामी रामकृष्ण और उनके पहले उनके अग्रज ने अपने नामों में अपनी जाति का उल्लेख नहीं किया।यह सिद्ध करता है कि भारतीय समाज कर्म को प्रधान मानता रहा,जाति को नहीं।स्वामी रामकृष्ण ने न केवल कालीभक्ति की उच्चतम साधना की, बल्कि हिंदू, इस्लाम और ईसाई—तीनों धर्मों की साधना कर यह प्रतिपादित किया कि सत्य एक है, मार्ग अनेक।
दक्षिणेश्वर काली मंदिर से ही आगे चलकर स्वामी विवेकानंद जैसे युगद्रष्टा राष्ट्रसंत का उद्भव हुआ, जिन्होंने शिकागो के विश्व धर्म महासभा में भारत की समन्वयकारी चेतना का उद्घोष किया। यदि भारत का समाज जन्माधारित जातीय विष से ग्रस्त होता, तो न रानी रासमणि द्वारा निर्मित मंदिर स्वीकार्य होता, न ब्राह्मण पुजारी वहाँ सेवा करते और न ही स्वामी रामकृष्ण एवं विवेकानंद जैसे महापुरुष विश्वमान्य होते।
भारतीय वांग्मय और ग्रन्थ भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि भारतीय परंपरा जन्म नहीं, कर्म प्रधान है।
भारतीय समाज मूलतः जाति नहीं, कर्म पर आधारित रहा है। इसीलिए वाल्मीकि आदिकवि, व्यास महर्षि कृष्ण द्वैपायन, शुकदेव परमहंस, कबीर महात्मा और रैदास संत कहे गए—किसी ग्रंथ में उन्हें जाति-सूचक विशेषणों से नहीं बाँधा गया। यदि आज जैसी जातीय राजनीति उस समय होती, तो यह स्वीकार्यता असंभव थी।यदि जातिगत विदेश होता तो संत रैदास की पहुंच रानी मीराबाई तक नहीं होती,महात्मा कबीर स्वामी रामानुज के शिष्य नहीं होते,पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम अपने ब्राह्मण गुरु के योगदान के अभाव में सफल नहीं होते,भीमराव अंबेडकर इतिहास से विलुप्त हो जाते।बात चाहे महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ का हो या पंडित महावीर अंबेडकर का,कहीं भी जातिगत विद्वेष का भाव दृष्टिगोचर नहीं होता है। हाँ,धर्म विरुद्ध कर्म करने वालों को नीच और पापात्मा अवश्य माना जाता था।उदाहरण स्वरूप महर्षि अगस्त्य का पौत्र होने के बावजूद रावण को राक्षस,और धर्म की गांठ बांधे प्रहलाद को राक्षस पुत्र होने के बावजूद महान भक्त कहा गया।
इससे प्रमाणित होता है कि राष्ट्रीयता कोई वस्तु नहीं, बल्कि बीज रूपी महामंत्र है, जो नागरिकों के हृदय में परस्पर प्रेम, विश्वास और राष्ट्र-समर्पण से अंकुरित होता है। किंतु आज की राजनीति जाति को जाति से और धर्म को धर्म से लड़ाकर सत्ता की फसल काटना चाहती है। इससे राष्ट्र कमजोर होता है और राष्ट्रविरोधी शक्तियों को अवसर मिलता है।किसी कवि ने ठीक ही कहा है—
“रहनुमा देश के गुल खिलाने लगे,
ये जनता से जनता लड़ाने लगे।”
वास्तव में जातीय राजनीति भारत की परंपरा नहीं, बल्कि औपनिवेशिक विरासत है, जिसे आज के राजनेता और अनेक धार्मिक भेड़िए खाद-पानी दे रहे हैं। समय की माँग है कि राजनीति पुनः राष्ट्र, नीति और नैतिकता के पथ पर लौटे—अन्यथा जाति की यह राजनीतिक फसल अंततः राष्ट्रीयता की भूमि को ही बंजर कर देगी।
— डॉ. उदयराज मिश्र
चिंतक एवं विचारक




