साहित्य

रोज़ जीते हुए भी दुनिया खुश नहीं

डॉ रामशंकर चंचल

मैं दुनियां को
रोज़ रोज़ जीते
दिखता हूं
सोचता हूं
यह कैसा जीना
को जीते हुए भी
खुश नहीं दिखाई देता
मेरी तरह
में रोज रोज़ मर मर के जीता हूं
और उन सभी से ज्यादा खुश
राहत हूं कि
आज फिर मारने की
कोशिश की गई
मुझे, मैं टूटन, घुटन
महसूस करूं और
दुःखी रहूं
पर देखता हूं
न जाने क्या है
कोई अदृश्य शक्ति
जिसे हम ईश्वर कहते है
अचानक भीतर विराजमान हो
अद्भुत सृजन को
जन्म दे, अद्भुत सुखद
अहसास करा जाती है
लगता हैं एजे फिर
कोई अद्भुत लेखन
अद्भुत कृति जन्म ली
जो एक और नया इतिहास रच
जायेगी और दुनिया के
जीने के मरे हुए से
चेहरे पर तरस आ
ईश्वर से प्रार्थना करता हूं
प्रभु इन्हें क्यों नहीं
जिंदगी की परिभाषा
समझता जहां
हर हाल में
जिंदगी मेरी तरह
मस्त और प्रसन्न हो
प्रतिदिन गुजरी जा सकती हैं
खैर ईश्वर जाने
राम जाने
उसकी महिमा
में तो अपने आराध्य को
ईश्वर को
रूह को सत् सत् प्रणाम करता
जो रोज रोज मुझे मारती हैं
और किसी अद्भुत सृजन को
जन्म देता है

डॉ रामशंकर चंचल
झाबुआ मध्य प्रदेश

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