
संगति हो विद्वान की, सदा मिलेगी राह।
रस्ता वह मिल जायगा,जिसकी तुमको चाह।।
ज्ञानी सज्जन साधु की, संगति बहुत सुजान।
जीवन में मानव सदा, करता है उत्थान।।
जाको जस व्यवहार है, तैसी संगति पाइ।
सुरा चाहियेगा जिसे, मदिरालय ही जाइ।।
संगति सज्जन कीजिये, बना लीजिये मीत।
खुशियों के फिर गाँयगे, आप सदा मधुगीत।।
संगति से पिक बोलता, सुन्दर मीठी बानि।
जस हो संगति पात्र की, रूप धर्यो है पानि।।
✍️ नरेश चन्द्र उनियाल,
पौड़ी गढ़वाल, देवभूमि, उत्तराखण्ड।



