
मेरा बचपन और गाँव की गर्मियों की छुट्टियाँ—ये केवल बीते हुए दिन नहीं, बल्कि जीवन की वह पूँजी हैं जो आज भी मन को ऊर्जा और सुकून से भर देती हैं। जैसे ही गर्मियों की छुट्टियाँ नज़दीक आतीं, मन अपने आप गाँव की ओर उड़ने लगता। गोरखपुर जिले के सुदूर दक्षिणांचल में बसा मेरा गाँव, जहाँ एक ओर जीवनदायिनी राप्ती नदी बहती है और दूसरी ओर तरेना नाला अपनी चंचल धारा के साथ गाँव को प्रकृति के सुरम्य आँचल में समेटे रहता है।
उस दौर में गाँव तक पहुँचना अपने आप में एक रोमांचक यात्रा हुआ करती थी। हम ट्रेन से दोहरीघाट उतरते थे। वहाँ से रिक्शे पर सवार होकर बरहलगंज पहुँचते और पौहारी महाराज जी के चरणपादुका में शीश नवाकर यात्रा की थकान और उत्साह दोनों को सँभालते थे। इसके बाद असली इंतज़ार होता था—गाँव से आने वाली लडिहा या डनलप का। लडिहा, जिसके लकड़ी के पहिए बैलों की चाल के साथ चरमराते थे, और डनलप, जिसके टायर थोड़ी तेज़ और सहज यात्रा का अहसास कराते थे—यही हमारे गाँव की जीवनरेखा थीं।
सुबह जब लडिहा या डनलप आती, तो बच्चों की टोली उल्लास से भर उठती। हम सब अपने छोटे-छोटे बस्ते उठाकर, हँसते–कूदते तरेना नाला पार करते और जैसे ही गाँव की सीमा में प्रवेश करते, लगता मानो अपनेपन की गोद में लौट आए हों। रास्ते भर लोककथाएँ, हँसी-मज़ाक और भविष्य की योजनाएँ चलती रहतीं—कौन किसके घर जाएगा, कौन नदी में सबसे पहले नहाएगा, और कौन आम के बाग़ में पहरा देगा।
गाँव की सुबहें अपने आप में एक संस्कार थीं। भोर होते ही कोयल की कूक और बैलों की घंटियों की आवाज़ के साथ नींद खुलती। हम बच्चे मैदान की ओर दौड़ पड़ते—कभी कबड्डी, कभी गिट्टे, तो कभी बेफिक्र दौड़। इसके बाद मड़ई में बैठकर नीम या बबूल की दातुन से दाँत साफ़ करना, ठंडे पानी से कुल्ला करना और फिर इनार पर स्नान—इन सबमें एक अलग ही ताजगी होती थी। सुबह दस बजे तक सादा लेकिन स्वादिष्ट भोजन मिल जाता—रोटी, सब्ज़ी, दही या माड़—और पेट भरते ही फिर बाहर की दुनिया हमें बुलाने लगती।
दिन का समय हम उम्र बच्चों की मस्ती में बीतता। गर्मियों का यह समय गेहूँ की कटाई का भी होता था। खेतों में सुनहरी फसलें तैयार खड़ी रहतीं। बड़े लोग हँसिए से गेहूँ काटते और हम बच्चे उनके पीछे-पीछे दौड़ते। कटे हुए गेहूँ के बोझ बनाए जाते, उन्हें एक जगह इकट्ठा किया जाता और फिर खलिहान में बैलों से मड़ाई होती। बैलों के पैरों के नीचे से छनकर निकलता अनाज और उड़ती भूसी आज भी आँखों के सामने तैर जाती है। उस प्रक्रिया में हमें परिश्रम का मूल्य और अन्न का सम्मान सहज ही सीखने को मिलता था।
दोपहर की तपती धूप में दौरी और औसोनी का आनंद कुछ और ही होता। घर से कुछ कदम की दूरी पर स्थित दोहरी का किनारा हमारा सबसे प्रिय स्थान था। कभी कभी कभी एक-दूसरे पर पानी के छींटे उड़ाते और कभी नदी किनारे बैठकर सपनों की बातें करते। शाम ढलते-ढलते गाँव में फिर चहल-पहल बढ़ जाती। मडई पर इनार के किनारे पर बुज़ुर्गों की चर्चा, कहीं घरों से उठती चूल्हे की महक और कहीं मंदिर से आती आरती की ध्वनि सब मिलकर गाँव की आत्मा को जीवंत कर देते।
रातें भी कम सुहानी नहीं होती थीं। खुले आँगन में खाट डालकर या छत पर एक साथ कथरी बिछाकर सोना, तारों भरे आसमान को निहारना और दादी चाची की कहानियाँ सुनते-सुनते नींद के आगोश में चले जाना यह सुख आज के वातानुकूलित कमरों में भी दुर्लभ है।
आज जब समय बहुत आगे निकल चुका है, साधन बढ़ गए हैं और जीवन तेज़ हो गया है, तब भी मेरा मन उन दिनों की ओर लौट जाता है। मेरा बचपन और गाँव की गर्मियों की छुट्टियाँ मुझे सिखा गईं कि सच्चा आनंद सादगी, अपनत्व और प्रकृति के साथ तालमेल में ही छिपा होता है। वही स्मृतियाँ आज भी मेरी संवेदना, सोच और लेखनी को दिशा देती हैं।




