
जब नैन मिले सिय के प्रभु से, यह रूप अलौकिक नैन बसा लिया ।
शुभ सुंदर स्वप्न विवाह बुने, अपने दिल से कुछ बात करे सिया ।।
जब अंतस ये प्रण ठान लिया, स्व स्वयंवर सुंदर एक रचा दिया ।
मन से पति मान लिया इनको, हृद हर्षित भाव उमंग भरे जिया ।।
जब मातु विदा करती सिय को, तब आँचल में इक सीख भरी नई ।
कहती यह याद सदा रखना, इतना कह बात कही उनको कई ।।
पितु का कुल उच्च रहे जब तू, ससुराल बहू बन फर्ज निभा दई ।
जब सास कहे तब ध्यान रखो, अनुशासन की हर बात कही गई ।।
यह जीवन डोर बंधी जिनसे, अब साथ सदा उनके रहना सिया ।
पितु के घर की पहुना अब तू, पति के घर को समझो अपना सिया ।।
ससुराल कुटुम्ब मिले जितने, उनका तुम आदर भी करना सिया ।
अब मात पिता परिवार वही, मधु सा व्यवहार वहां रखना सिया ।।
नीलम अग्रवाल “रत्न” बैंगलोर
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