
मिट्टी का है हमारा ये तन की धन
मिट्टी से बना जीवन की जहान
दफन होना है जब मिट्टी मै ही
फिर किस बात की है ये गुरूर अभिमान
ये जग दो दिन का जब मेला है
दो दिन का ही जीवन का झमेला है
फिर किस बात की है ये झुठा गुमान
एक दिन तन भी हो जायेगा गुमनाम
जग में जो आया है उसे लौट कर है जाना
मानवता को सिर्फ जग ने है आज पहचाना
झुठा दुनियां का क्यूं हाथ पकड़ा है रे नादान
क्षण भर का है तुँ इस जग का एक मेहमान
ना कोई यहाँ रहा है ना कोई यहाँ रहेगा
पैदा लेने वाला जग में आकर खुद ही रोयेगा
कर्म का फल पाने पर मत बनना अनजान
बदनामी के दलदल है खुद मत बन शैतान
जीयो खुद खुशी से और औरों को जीने दो
रब का दिया जल अमृत है सबको पीने दो
ये जग है एक सराय खुद मत बन तुँ भगवान
इतिहास लिख देगें तेरा भी जग में विद्वान
उदय किशोर साह
मो० पो० जयपुर जिला बांका बिहार




