
कुहासे की चादर ओढ़े भोर खड़ी,
धूप भी सर्दी से सहमी-सी पड़ी।
हाथों में चाय, अलाव का ताप,
सर्दी ने सिखाया सुकून का हिसाब।
कंबल में सिमटा हर एक ख्वाब,
रातें लंबी, मीठी-सी नींद बेहिसाब।
खेतों में ओस, पत्तों पर मोती,
ठिठुरती हवा भी लगती है सोती।
माँ की रसोई, गाजर का हलवा,
भाप उड़ाता सूप—मन को भाए हर पलवा।
सर्दी आई तो रिश्ते गरमाए,
पास बैठकर किस्से फिर मुस्काए।
ठंड की चुप्पी में गहरी बात,
सर्दी—संयम, स्नेह और आत्मीय रात।
जीवन की दौड़ में ठहरने का संदेश लाए,
सर्दी हमें भीतर की गर्माहट पहचानना सिखाए।
डॉ सुरेश जांगडा
राजकीय महाविद्यालय सांपला, रोहतक (हरियाणा)




