आलेख

स्वामी श्रद्धानंद जी : राष्ट्र, धर्म और शिक्षा के लिए अमर बलिदान

बलिदान दिवस : 23 दिसम्बर पर विशेष 

डाॅ.शिवेश्वर दत्त पाण्डेय 
स्वामी श्रद्धानंद जी भारतीय नवजागरण के उन तेजस्वी संन्यासियों में थे, जिनका जीवन केवल उपदेशों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कर्म, संघर्ष और बलिदान का जीवंत उदाहरण बना। 23 दिसम्बर 1926 को उन्होंने जिस प्रकार राष्ट्र, धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग किया, वह भारतीय इतिहास में अद्वितीय है।
स्वामी श्रद्धानंद जी का जन्म 2 फ़रवरी 1856 को उत्तर प्रदेश के मथुरा जनपद में हुआ। उनका मूल नाम मुंशी राम था। आर्य समाज के महान नेता स्वामी दयानंद सरस्वती के विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने संन्यास ग्रहण किया और जीवन को वेद, सत्य, शिक्षा और राष्ट्र-सेवा को समर्पित कर दिया। उनके लिए धर्म कर्मकांड नहीं, बल्कि समाज को जाग्रत करने का साधन था।
उनकी सबसे बड़ी देन गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय (हरिद्वार) की स्थापना है। यह संस्थान भारतीय गुरुकुलीय शिक्षा परंपरा का आधुनिक स्वरूप बना, जहाँ वेद, संस्कृत, योग, आयुर्वेद और चरित्र निर्माण को शिक्षा का केंद्र बनाया गया। स्वामी श्रद्धानंद जी का दृढ़ विश्वास था कि जब तक शिक्षा भारतीय मूल्यों से जुड़ी नहीं होगी, तब तक राष्ट्र आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी नहीं बन सकता।
स्वामी श्रद्धानंद जी सामाजिक कुरीतियों के प्रबल विरोधी थे। उन्होंने जाति-पांत, छुआछूत और सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध आवाज़ उठाई। शुद्धि आंदोलन के माध्यम से उन्होंने उन लोगों को पुनः सनातन धर्म से जोड़ा, जिन्हें बलपूर्वक या छल से धर्मांतरित किया गया था। यह कार्य उनके लिए अत्यंत जोखिम भरा था, किंतु उन्होंने कभी सत्य का मार्ग नहीं छोड़ा।
राष्ट्रहित में उनका निर्भीक स्वर अनेक असामाजिक और राष्ट्रविरोधी शक्तियों को असहनीय लगा। अंततः 23 दिसम्बर 1926 को दिल्ली में एक कट्टरपंथी द्वारा उनकी हत्या कर दी गई। उनका शरीर भले ही नष्ट हुआ, किंतु उनके विचार आज भी जीवित हैं। यह बलिदान किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए दिया गया महायज्ञ था।
स्वामी श्रद्धानंद जी का जीवन हमें यह सिखाता है कि राष्ट्र-निर्माण केवल नारों से नहीं होता, बल्कि त्याग, तपस्या और साहस से होता है। उनका बलिदान आज भी प्रत्येक भारतीय को यह स्मरण कराता है कि धर्म, शिक्षा और संस्कृति की रक्षा के लिए सजग रहना हमारा कर्तव्य है।
बलिदान दिवस पर स्वामी श्रद्धानंद जी को शत्-शत् नमन।
उनका जीवन और बलिदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा-पुंज बना रहेगा।

(लेखक दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह के संस्थापक एवं समूह सम्पादक हैं)

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