
ठंडक बैरी ने किया, जीना बहुत मुहाल।
नव दुल्हन-सी घूमती, धूप ओढ़कर शाल।
रूखी-सूखी है त्वचा, उलझे-उलझे बाल।
होंठ शुष्क-से हो गए, फटे हुए हैं गाल।
मूंगफली अरु रेवड़ी, की है मौज-बहार।
घड़ी-घड़ी ही देखिए, लेती चाय उबाल।
वृक्षों से पत्ते झरे, रुष्ट हुए हैं पुष्प।
खग-पशु अब दिखते नहीं, छिपते कीट पुआल।
स्वेटर कंबल टोपियाँ, मफलर मोजे तान।
घर में ‘ऋतु’ दुबके सभी, सूनी है चौपाल।।
डॉ ऋतु अग्रवाल
मेरठ, उत्तर प्रदेश




