साहित्य

ठंडक

डॉ ऋतु अग्रवाल

ठंडक बैरी ने किया, जीना बहुत मुहाल।
नव दुल्हन-सी घूमती, धूप ओढ़कर शाल।

रूखी-सूखी है त्वचा, उलझे-उलझे बाल।
होंठ शुष्क-से हो गए, फटे हुए हैं गाल।

मूंगफली अरु रेवड़ी, की है मौज-बहार।
घड़ी-घड़ी ही देखिए, लेती चाय उबाल।

वृक्षों से पत्ते झरे, रुष्ट हुए हैं पुष्प।
खग-पशु अब दिखते नहीं, छिपते कीट पुआल।

स्वेटर कंबल टोपियाँ, मफलर मोजे तान।
घर में ‘ऋतु’ दुबके सभी, सूनी है चौपाल।।

डॉ ऋतु अग्रवाल
मेरठ, उत्तर प्रदेश

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