साहित्य

तपोबल

रविशंकर शुक्ल

वन प्रान्त से
गुजरते हुए एक महान ॠषि जाजलि,
अचानक एक सारस पक्षी ने
कर दिया उनके उपर बीट
क्रोधित होकर ऋषि ने देखा
उस पक्षी को और
कर दिया उसे जलाकर भस्म
अगले पड़ाव पर एक नगर
और नगर के एक मकान का एक द्वार
याचक की मुद्रा में ऋषि
गृहस्वामिनी अपने कार्य में व्यस्त
कई बार पुकारने और लम्बी प्रतीक्षा के बाद
गृहिणी हुई उपस्थित
ऋषि की मुखमुद्रा में वही क्रोध
जिससे भस्म किया था उन्होंने एक पक्षी
गृहिणी ने क्षमायाचना की
पर ऋषि की भावभंगिमा जैसी की तैसी
तब गृहिणी ने शान्त भाव से कहा
“मैं कोई सारस पक्षी नहीँ कि आप के क्रोधित नेत्रों से जलकर भस्म हो जाऊँगी”
प्रश्न वही है
किसका तपोबल अधिक है?

“स्त्री”
हम तुम्हें
‘सीता’कहते हैं,’सावित्री’कहते हैं
‘अपाला’ कहते हैं,’मांडवी’ कहते हैं
‘दुर्गा’कहते हैं, ‘लक्ष्मी’कहते हैं
इस तरह के कितने श्रद्धाजनित नाम हम देते हैं,
आदर करते हैं,
तुम्हारी करूणगाथा को
देख-सुनकर
संवेदनाजनित अवसाद के
अश्रु कणों को शब्दों का
रूप देते हैं
दो मात्राएँ बढ़ा कर नर से नारी बना,
कार्यक्षेत्र और जिम्मेदारी का
बोझ भी बढ़ाते हैं
हम तैंतीस कोटि देवी-देवता पूज सकते हैं
पर तुम्हें तैंतीस प्रतिशत अधिकार नहीं दे सकते,
तुम्हारे उत्पीड़न पर सिर्फ और सिर्फ
लकीर पीटते हैं।

रविशंकर शुक्ल

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