
भाषा देवों की बनी, संस्कृत जिसका नाम।
हिंदी इसकी है सुता,जिसकी कीर्ति ललाम।
विश्व पटल पहचान है,सभी गुणों से युक्त,
मधुर भाव से है भरी,मनहर इसका धाम।।
संस्कारों की छांँव है,वैज्ञानिक आधार।
एक सूत्र में बाँधती,भरा ज्ञान का सार।
अलंकार रस छंद का,अनुपम निज सहयोग,
बढ़ जाता लालित्य है,आता शब्द निखार।।
करें प्रतिज्ञा आज हम,दिव्य शक्ति का भान।
वैचारिक अभि व्यक्ति से, दिनकर सम दें मान।
भाषा यह अनमोल है, सब जन करें प्रयोग,
सकल विश्व में गूंँज हो,गाएँ मिल जय गान।।
हिंदी के ज्ञाता बने,गोरी पुत्र गणेश।
हिंदी सब अपनाइए,सुखद बने परिवेश।
झंकृत करती है सदा,मन वीणा के तार,
पा न सकी अधिकार पर, अपने भारत देश।।
डॉ गीता पांडेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश




