विदेश नीति में शिष्टाचार ही राष्ट्र की असली पहचान: ✍️कुमुद रंजन सिंह
अंतरराष्ट्रीय संबंधों में शिष्टाचार केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि एक देश की सामूहिक संस्कृति और राजनीतिक परिपक्वता का दर्पण होता है। विशेषकर तब, जब सामने किसी मित्र राष्ट्र का राष्ट्राध्यक्ष हो, तो बातचीत, हावभाव और बैठने का तरीका भी कूटनीति का हिस्सा बन जाता है। ऐसे क्षणों में कोई पत्रकार, प्रतिनिधि या अधिकारी केवल स्वयं का नहीं, बल्कि पूरे देश का चेहरा बनकर उपस्थित होता है।
इस संदर्भ में यह समझना महत्वपूर्ण है कि यदि किसी विदेशी नेता ने विशेष रूप से एक वन-ऑन-वन इंटरैक्शन या इंटरव्यू का अवसर दिया है, तो यह किसी सामाजिक संदेश का मंच नहीं बन जाता। यह न तो महिला अधिकारों पर संवाद का संदर्भ था, न किसी राजनीतिक प्रतीकात्मकता का अवसर। इसलिए ऐसे क्षणों में प्रोटोकॉल से हटकर बैठना या अनावश्यक रूप से चर्चा का केंद्र बन जाना, केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि राष्ट्रीय मर्यादा को प्रभावित करता है।
कुछ लोग इस घटना को स्त्री-विरोध या misogyny से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि वास्तविकता बिल्कुल स्पष्ट है—
यह मसला लैंगिक भेदभाव का नहीं, बल्कि पेशेवर गरिमा और वैश्विक शिष्टाचार का है।
किसी भी पत्रकार का पहला दायित्व होता है कि वह इंटरव्यू, वार्ता या औपचारिक बैठक की गरिमा को समझे और उसी के अनुरूप व्यवहार करे।
नेशनल जर्नलिस्ट एसोसिएशन के राष्ट्रीय महासचिव कुमुद रंजन सिंह का कहना है कि “किसी भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर हमारे छोटे-छोटे व्यवहार ही हमारे देश की छवि तय करते हैं। सम्मान दिया भी जाता है और दिखाया भी जाता है—और दोनों ही अनिवार्य हैं।”
उनके अनुसार, पेशेवर आचार-संहिता, शारीरिक भाषा और शिष्टाचार से ही भारतीय पत्रकारिता विश्व पटल पर अपनी विश्वसनीय पहचान बनाती है।
विदेश नीति, मीडिया की भूमिका और कूटनीतिक व्यवहार—सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि पत्रकार संवाद के हर स्तर पर मर्यादा और प्रोटोकॉल का पालन करें। क्योंकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय हमारी भाषा से पहले हमारी आचरण शैली को पढ़ता है।
जब हम देश का प्रतिनिधित्व कर रहे हों, तो हर छोटी बात भी राष्ट्रीय गरिमा का प्रश्न बन जाती है।


