
“विवाह विच्छेद (तलाक़)”
सनातन धर्म में विवाह को जन्म जन्म का साथ माना जाता है, यह अभी से ही नही जब से सनातन में वैवाहिक जीवन का आरंभ हुआ है तब से ही है। लेकिन आज के समय में इस विवाह व्यवस्था में एक साथ रहकर जिम्मेदारी निभाने से महत्वपूर्ण अलग होकर स्वतंत्र जीवन जीने को महत्व दिया जाने लगा है।यह मानसिकता जो विवाह व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने की कारक बनती जा रही है इसका प्रस्फुटन पाश्चात्य संस्कृति और सभ्यता में ज्यादा मिलता है जहॉं विवाह निभाने के लिए नही शारीरिक रूप से संतुष्टि को लेकर किए जातें हैं और एक निश्चित समयोपरांत फिर से विवाह विच्छेद कर के नये साथी का हाथ थाम लिया जाता है जिससे वहॉं अनाथालयों में ऐसे अवांछित वैवाहिक जीवन में शारीरिक संबंधों के कारण उत्पन्न हुए शिशुओं को रखा जाता है और उनका पालन-पोषण किया जाता है और इन्हीं बच्चों की शिक्षा हेतु कान्वेंट स्कूलों को वहॉं खोला गया है जिससे यह सब शिक्षा पाकर अपने जीवन में भौतिक सुख पाने की योग्यता प्राप्त कर सकें।
विवाह विच्छेद(तलाक़):-
विभिन्न रीति रिवाजों और ईश्वर को साक्षी मानकर जो रिश्ता मजबूत विश्वास, प्रेम और समर्पण से बनाकर जीवन में आगे बढ़ने और कुल की मर्यादा का ध्यान रखते हुए अपनी कुल वृद्धि करने और कठिनतम परिस्थितियों में एक दूसरे की हिम्मत बनकर निभाने की जिम्मेदारी होती है उसी रिश्ते को कानूनी नोटिस और कानूनी पत्रों के द्वारा कानूनी प्रक्रिया से अलग कर दिया जाता है जहॉं इसका एक कारण विवाह पश्चात जिम्मेदारी से मुक्त होना होता है वहीं दूसरी ओर अपने जीवनसाथी पर कानूनी दबाव बनाकर उससे खर्च लिया जाता है और इसे आज के समय में स्त्री स्वतंत्रता का नाम देकर प्रचलित और प्रचारित किया जा रहा है।जो की सामाजिक स्थिरता को
छिन्न भिन्न कर रहा है।
विवाह विच्छेद के मामलों में बढ़ोतरी के कारण:-
आधुनिक समाज परिवार से ज्यादा भौतिकता को अहमियत देने लगा है जिसके कारण नई पीढ़ी रिश्तों को खत्म करने का भय लगभग खत्म हो चुका है। जहाॅं पहले सहनशीलता का स्तर रिश्ते को बनाकर रखता था वहीं आज यह बिलकुल खत्म हो चुकी है जिसके कारण पति-पत्नी एक-दूसरे की छोटी छोटी बातें भी सहन नहीं करते हैं और फिर धीरे-धीरे ये बातें इतनी बड़ी हो जाती हैं कि अंततः विवाह विच्छेद ही एकमात्र रास्ता दिखने लग जाता है।
आवेश में आकर विवाह विच्छेद करके आगे बढ़ जाना तो आसान है लेकिन इसकी प्रक्रिया से गुज़रना बहुत मुश्किल होता है। संभवतः विवाह विच्छेद प्रकिया इतनी जटिल रखना भी रिश्ते को अहमियत देने के कारण ही रखा होगा।
दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा एक टिप्पणी में हाल ही में कहा गया कि बेटी के ससुराल में लड़की की मां का आवश्यकता से अधिक दखल देना भी आजकल परिवारों के टूटने का मुख्य कारण बन गया है। पहले जहॉं मॉं अपनी लड़की को कहती थी अब से अपने परिवार से ज्यादा अपने पति के परिवार का ध्यान रखना वहीं आज कहा जाता है विवाह विच्छेद करके अलग हो जाओ और विवाह विच्छेद के बाद उससे अपने भरण-पोषण के लिए हर महीने भत्ता भी लेना है। तलाक के बाद तलाकशुदा आरक्षित कोटे से नौकरी मिलना भी आसान हो जाएगा।
वहीं विवाह विच्छेद (तलाक) के कुछ मामले ऐसे भी आ रहे हैं जहॉं विवाह विच्छेद करने का आधार बहुत ही बचकाना होता है।
जैसे पति या पत्नी द्वारा पालतू कुत्ते को पालना, पति का ज्यादा खर्राटे लेना, पति का पत्नी को हनीमून पर गोवा न ले जाकर किसी धार्मिक स्थल पर लेकर जाना आदि।
जब भी किसी शख्स द्वारा वकील के पास विवाह विच्छेद का केस लेकर जाता है तो वकील तलाक न लेने और उसकी जटिल प्रक्रिया से बचने के लिए ही कहते हैं। ठीक वैसे ही जब अदालतों में तलाक के केस दाखिल किए जातें हैं तो न्यायाधीश की भी पूरी कोशिश रहती है कि दोनों पक्ष आपस में सहमति से ही मामला सुलझा लें। लेकिन चाहे जज हो या वकील, दोनों का काम मात्र सलाह देना न
और समझाना है, अंतिम निर्णय तो दोनों पक्ष ही लेते हैं।
विवाह विच्छेद कानून:-
भारत में हिंदू जोड़े द्वारा तलाक़ दो तरह से लिया जा सकता है:
1. आपसी सहमति से
(सेक्शन 13B हिंदू मैरिज ऐक्ट 1955)
2. जब पति-पत्नी में से एक पक्ष ही तलाक लेने के पक्ष में हो
(सेक्शन 13 हिंदू मैरिज ऐक्ट 1955)
सहमति से विवाह विच्छेद
(Divorce by Mutual Consent):-
आपसी सहमति से लिए जाना वाला अलग होने का निर्णय आसान होता है। जिसमें मुख्य शर्त यह होती है कि पति-पत्नी दोनों कम से कम एक साल से अलग रह रहे हों तत्पश्चात् दोनों मिलकर न्यायालय में विवाह विच्छेद (तलाक़) हेतु प्रार्थना पत्र लगाते हैं।
कोर्ट अपने सामने दोनों के बयानों को सुनता है और उन्हें रिकार्ड करवाया जाता है फिर हस्ताक्षर कराए जाते हैं। तत्पश्चात् कोर्ट दोनों को रिश्ता बचाने हेतु और अपने निर्णय पर पुनर्विचार के लिए 6 महीने का समय देता है। दूसरा प्रार्थना पत्र पहले प्रार्थना पत्र के 6 से 18 महीने के मध्य में लगाई जाती है। जब 6 महीने पूरे हो जाते हैं और दोनों के बीच रिश्ते को लेकर सहमति नहीं बन पाती तब एक और प्रार्थना पत्र लगाया जाता है जिसके बाद कोर्ट द्वारा दोनों के विवाह विच्छेद (तलाक़)का अंतिम निर्णय दे दिया जाता है। बहुत सी बार इसी दौरान दोनों में आपसी सहमति बन जाती है जिससे घर दोबारा बस जाता है।
कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित आदेश में कहा गया था की अगर शादी में समझौते का कोई रास्ता न हो तो 6 महीने की समय-सीमा को खत्म भी कर सकते हैं और 6 महीने पूरे होने से पहले भी दूसरा प्रार्थना पत्र लगाया जा सकता है । इसमें न्यूनतम अवधि की कोई शर्त नहीं है अर्थात् फर्स्ट मोशन पास होने और उस आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने के बाद तुरंत ही सेकंड मोशन की पिटिशन लगा सकते हैं।
उदाहरणार्थ :- दोनों पक्षों द्वारा मिलकर किया जाने वाला विवाह विच्छेद (तलाक)
(म्युचुअल कंसेंट वाला डिवोर्स)
1 जनवरी 2023 को विवाह हुआ और किसी कारणवश पति-पत्नी 1 फरवरी 2023 से अलग
अलग रहने लग जाते हैं तब
हिंदू मैरिज ऐक्ट 1955 के अनुसार:-
31 जनवरी 2024 के पश्चात् ही वे दोनों मिलकर फैमिली कोर्ट में विवाह विच्छेद (तलाक़) के लिए आवेदन कर सकते हैं।
उन्होंने 1 अगस्त 2024 को कोर्ट में विवाह विच्छेद के लिए आवेदन किया और 4 अगस्त 2024 को जज के सामने सुनवाई के लिए आ गए।
उसी दिन जज द्वारा दोनों पक्षों से सवाल-जवाब किए गए और यह तय किया गया की दोनों पक्ष अब साथ नहीं रहना चाहते। तत्पश्चात् उन्होंने फर्स्ट मोशन का ऑर्डर पास कर दिया अर्थात्
सहमति से अलग होने की एक सीढ़ी चढ़ गये।
यहीं कानून यह प्रावधान करता है की 4 अगस्त के बाद कम से कम 6 महीने और ज्यादा से ज्यादा 18 महीने तक म्युचुअल कंसेंट डायवोर्स के दूसरे मोशन के लिए आवेदन नही किया जा सकता लेकिन कुछ समय पूर्व सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित आदेश में यह कहा गया कि अगर दोनों में किसी भी तरह के समझौते की कोई संभावना शेष न हो तो आवेदन देने के लिए कोर्ट न्यूनतम 6 महीने की समय-सीमा खत्म कर सकता है और दूसरे मोशन के लिए आवेदन किया जा सकता है।
8 अगस्त को पारित आदेश की प्रमाणित प्रति
के लिए कोर्ट में आवेदन किया। 21 अगस्त को फर्स्ट मोशन की प्रमाणित प्रति कोर्ट से प्राप्त हो गई।11 सितंबर को दोनों ने मिलकर सेकंड मोशन के लिए आवेदन कर दिया और इसके साथ ही 6 महीने की समय सीमा को खत्म करने के लिए भी आवेदन किया।
जिससे यह पिटिशन 14 सितंबर को कोर्ट के सामने सुनवाई के लिए प्रस्तुत की गई और उसी दिन दोनो पक्षों के बयान सुनने के बाद 14 सितंबर के दिन ही विवाह विच्छेद की डिक्री पारित कर दी गई।
और इस प्रकार एक वैवाहिक जीवन का अंत हो गया।
किसी भी पक्ष द्वारा विवाह विच्छेद (तलाक़) के लिए आवेदन करना (कंटेस्टेड डायवोर्स):-
एक पक्ष द्वारा लिए जाने वाले विवाह विच्छेद (तलाक़)की प्रक्रिया लंबी और कठिन होती है। यह निर्णय उस समय लिया जाता है जब एक पक्ष विवाह विच्छेद (तलाक़)लेने की इच्छा रखता हो हो और दूसरा नहीं। इस मामले में याचिकाकर्ता को तलाक लेने के लिए आधार बताना होता है। वह हिंदू मैरिज ऐक्ट 1955 के सेक्शन 13 में दिए गए विवाह विच्छेद के लिए दिए गए आधारों में से किसी भी आधार पर विवाह विच्छेद (तलाक़) के लिए आवेदन कर सकता है।जिस आधार पर ही विवाह विच्छेद के लिए आवेदन किया गया है उसके लिए पुख्ता सबूत होने बहुत आवश्यक है।
तत्पश्चात् ही कोर्ट में आवेदन और सारे सबूत पेश किए जाते हैं।
विवाह विच्छेद (तलाक़) के लिए मुख्य आधार जो सेक्शन 13 में दिए गए हैं, वे इस प्रकार हैं। (इनमें से कोई एक या ज्यादा आधारों पर भी आवेदन किया जा सकता है।)
व्यभिचार (Living In Adultery): विवाहोपरांत किसी अन्य स्त्री से सहवास करना या उसके साथ संबंध बनाना।
क्रूरता (Cruelty):
शादी के बाद अपने जीवनसाथी के साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार किया हो। जिसमें
शारीरिक, मानसिक और वित्तीय क्रुरता भी हो सकती है। वित्तीय अर्थात् पहले पक्ष द्वारा दूसरे पक्ष को आवश्यक खर्चों के लिए पैसे न देना।
परित्याग (Desertion):
आवेदन के दो वर्ष पहले से दोनों अलग-अलग रहें हो जिसका कोई ठोस कारण न हो।
धर्मांतरण (Proselytize:
यदि दोनों में से किसी ने भी धर्म परिवर्तन कर लिया हो अर्थात् अब वो हिन्दू नहीं रहा।
मानसिक विकार (Unsound Mind):-
वह असाध्य रूप से विकृत मस्तिष्क या पागल का हो या फिर निरंतर या रुक-रुक कर मानसिक विकार से पीड़ित हो रहा हो और इस सीमा तक पीड़ित हो कि याचिकाकर्ता यह अपेक्षा नहीं कर सके की वह दूसरे पक्ष के साथ रह सके।
यौन संचारित बीमारी (STD):
दोनों में से कोई भी संक्रामक यौन रोग से पीड़ित हो।
संन्यास:दूसरे पक्ष द्वारा संन्यास ग्रहण करना।
सूचना न मिलना:
एक पक्ष को दूसरे पक्ष के जीवित होने या नहीं होने के बारे में सात वर्ष या उससे अधिक समय तक कोई जानकारी न होना।
नोट: विवाह विच्छेद के लिए आवेदन करने के कुछ और आधार भी हैं पर यहां मुख्य आधारों का ही उल्लेख किया गया है। यह प्रक्रिया बहुत लंबी और मुश्किल है।
1. एक पक्ष द्वारा विवाह विच्छेद (तलाक़) का आवेदन करना।
2. कोर्ट द्वारा दूसरे पक्ष को नोटिस भेजना ।
3. दूसरा पक्ष द्वारा आवेदन का जवाब प्रस्तुत करना।
4. पहले पक्ष द्वारा दूसरे पक्ष के जवाब का जवाब देना।
5. केस के मुद्दे तय होते हैं।
6. पहले पक्ष की ओर से कोर्ट में गवाही दी जाती है और दूसरे पक्ष का वकील गवाह से सवाल-जवाब करता है।
7. पहले पक्ष के द्वारा आवश्यक समझे जाने पर अपने केस के समर्थन में कुछ गवाह भी पेश किए जा सकते हैं।
8. फिर दूसरे पक्ष द्वारा आवश्यक समझे जाने पर अपने केस के समर्थन में कुछ गवाह भी पेश किए जा सकते हैं।
9. अंत में दोनों पक्षों के वकील बहस करते हैं और अदालत अपना निर्णय सुनाती है।
यह बहुत मुश्किल और बहुत अधिक समय लेने वाली प्रक्रिया है। जिस में 3 से 4 साल का समय लग ही जाता है।
मीडिएशन या मध्यस्थता:
मध्यस्थता विवाह विच्छेद (तलाक़) को रोकने का महत्वपूर्ण रास्ता है क्योंकि विवाह विच्छेद (तलाक़) के मामलों को खत्म होने में बहुत अधिक समय लग जाता है।
संक्षेप में कह सकते हैं की मध्यस्थ केंद्र का काम पति-पत्नी के रिश्ते को बचाकर रखना है।जब भी कोई इस प्रकार का केस किसी भी कोर्ट के सामने विवाह विच्छेद के लिए रखा जाता है तो सर्वप्रथम दोनों पक्षों को मध्यस्थता केंद्र भेज दिया जाता है जिससे वहॉं पर वो अपने आपसी विवाद बातचीत के माध्यम से खत्म कर के अपने वैवाहिक जीवन को फिर से शुरू कर सकें।ऐसा करने से उनके बीच के वाद-विवाद खत्म हो जातें हैं और विवाह विच्छेद तक बात नहीं जाती जिसके कारण कोर्ट के सामने भी चले आ रहे मुकदमों में भी कमी होती है ।
अक्सर यह बात सामने आती है कि पति-पत्नी के बीच का विवाद किसी मुद्दे पर आधारित न होकर छोटी-छोटी बातों पर आधारित होते हैं जो उन्हें समझाकर उनके बीच के वाद-विवाद खत्म किए जा सकते हैं।
मध्यस्थता केंद्र में अपनाई जाने वाली प्रणाली पूरी तरह से स्वैच्छिक वातावरण युक्त होती है जिससे दोनों पक्ष खुलकर अपने मन की बात एक दूसरे के सामने रख सकते हैं। जो मध्यस्थता करते हैं, वे दोनों पक्षों की बातें सुनकर उनकी समस्या का निवारण करते हैं।
एक मुकदमे के अंतर्गत कोर्ट द्वारा एक से ज्यादा बार भी दोनों पक्षों को मध्यस्थता केंद्र भेजा जा सकता है क्योंकि इस प्रकार करने से जो विवाद एक बार में खत्म नही हुए वो मध्यस्थता केंद्र में पुनः प्रयास करने पर खत्म हो जातें हैं।
तब नही होगा विवाह विच्छेद (तलाक़):
कई मामलों में यह देखा गया है कि पति-पत्नी में आपस में नहीं बनती लेकिन उनके बीच में विवाह विच्छेद (तलाक़)का कोई ठोस आधार होता। ऐसे में अगर दोनों विवाह विच्छेद (तलाक़)के लिए सहमत हैं तो उनका विवाह विच्छेद (तलाक़)हो जाता है।
लेकिन कोई भी पक्ष जो विवाह विच्छेद (तलाक़) चाहता हो उसके पास विवाह विच्छेद (तलाक़) के लिए बताए गए ठोस आधार होना आवश्यक है। अन्यथा विवाह विच्छेद (तलाक़)नहीं हो सकता।
विवाह विच्छेद (तलाक़) के मुकदमों के समय यह भी देखा गया है कि पति-पत्नी के साथ ही इसमें दोनों परिवारों के सदस्यों को भी अकारण ही घसीटा जाता है और उनके सम्मान पर दोषारोपण किया जाता है जिससे वो रिश्ता जोड़ने और बचाने की आखिरी उम्मीद भी खत्म कर दी जाती है क्योंकि कभी कभी आवेश में आकर अलग होने का निर्णय ले लिया जाता है और जब तक स्थिति समझ में आती है तब तक सब कुछ खत्म हो चुका होता है।
विवाह विच्छेद (तलाक़) के कारण दो परिवार ही नही दो पीढ़ी तक बर्बाद हो जाती है और इसका सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव छोटे बच्चों के मानसिक विकास पर भी पड़ता है क्योंकि उनका पालन-पोषण और परवरिश वैसे नही हो पाती जैसे होना आवश्यक होता है।
जहॉं तक मैं स्वयं मानता हूॅं की सनातन धर्म और संस्कृति जब तक इससे दूर थी सुरक्षित और संरक्षित थी लेकिन अब आधुनिकता और भौतिकता की चकाचौंध में ऐसा लग रहा है जैसे अपने हाथों हम हमारी संस्कृति को खत्म करना चाहते हैं जिसमें सबसे पहला कुठाराघात हमनें विवाह व्यवस्था पर किया है और अगर यह व्यवस्था छिन्न-भिन्न होती है तो फिर कल्पना कीजिए की हम हमारी आगामी पीढ़ी के लिए क्या छोड़कर जाएंगे?
यह यक्ष प्रश्न सामने खड़ा है निर्णय ही निर्णायक होगा।
कवि,लेखक, गीतकार,साहित्यकार:-
धीरज कुमार शुक्ला’दर्श’
ग्राम-पिपलाज,तहसील-खानपुर,
जिला-झालावाड़ ,राजस्थान (३२६०३८)


