आलेख

उलटी मार कबीर की, जो चित से दियो उतार

डॉ. पीयूष राजा

संत कबीर दास की यह पंक्ति – उलटी मार कबीर की, जो चित से दियो उतार, केवल एक दोहा नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक क्रांतिकारी पद्धति है। इस छोटी सी पंक्ति में कबीर ने मानव मन की सबसे बड़ी समस्या और उसका समाधान दोनों छिपा दिए हैं।
उलटबांसी का अर्थ और गहराई
कबीर की उलटी मार दरअसल उनकी उलटबांसी शैली को दर्शाती है। जहां आम इंसान सीधे-सीधे बात समझता है, वहीं कबीर उलटकर, विरोधाभास में, विपरीत दिशा से सत्य को प्रस्तुत करते हैं। यह उलटापन बाहरी नहीं, भीतरी है, जो हमारे मन में जमे हुए पूर्वाग्रहों, धारणाओं और मान्यताओं को उलट देता है। चित से दियो उतार, यही इस दोहे का मूल संदेश है। कबीर कहते हैं कि जो भी मन में बैठा है, उसे उतार फेंको। यह केवल बुरी बातों की नहीं, बल्कि अच्छे-बुरे सभी संस्कारों, धारणाओं और पूर्वाग्रहों की बात है। मन जब पूरी तरह खाली हो जाता है, तभी सच्चा ज्ञान उसमें प्रवेश कर सकता है।
आधुनिक मनोविज्ञान भी इस बात की पुष्टि करता है कि हमारे मन में जमा हुआ मानसिक कचरा, पुरानी धारणाएं, पूर्वाग्रह, अहंकार, हमें नई सोच और वास्तविकता को देखने से रोकता है।
आज के संदर्भ में प्रासंगिकता
सोशल मीडिया, समाचार चैनलों और तरह-तरह की सूचनाओं से भरी दुनिया में हमारा मन लगातार भरता जा रहा है। धर्म, जाति, राजनीति, समाज, हर विषय पर हमारे मन में पहले से बनी धारणाएं हैं। कबीर की उलटी मार हमें सिखाती है कि इन सबको एक तरफ रखकर, खाली मन से सोचें। जब तक हम अपने पूर्वाग्रहों के चश्मे से देखेंगे, तब तक सत्य दिखाई नहीं देगा। आज की पीढ़ी में एक खतरनाक प्रवृत्ति बढ़ रही है, लोग एक-दूसरे को नीचा दिखाने में, अपनी श्रेष्ठता साबित करने में, दूसरों को इग्नोर करके अपनी अहमियत जताने में, जज करने में, ट्रोल करने में आनंद लेते हैं। हर कोई खुद को दूसरे से बेहतर दिखाना चाहता है, चाहे वास्तविकता कुछ भी हो।
व्यावहारिक जीवन में उपयोग
रोजमर्रा की जिंदगी में इस सिद्धांत को कैसे अपनाएं? किसी व्यक्ति से मिलने से पहले उसके बारे में जो धारणा बना ली है, उसे उतार दें। किसी विचार को सुनते समय पहले से बनी राय को किनारे रख दें। किसी स्थिति का सामना करते समय पुराने अनुभवों के आधार पर तुरंत निर्णय न लें। लेकिन कबीर की इस शिक्षा का सबसे गहरा पहलू यह है कि जो लोग आपको नीचा दिखाते हैं, अपमानित करते हैं, घमंड से पेश आते हैं या आपको इग्नोर करते हैं, उन्हें भी अपने मन से उतार दो। उनकी याद, उनके शब्द, उनका व्यवहार, इन सबको मन में जगह मत दो। जब कोई आपको आहत करता है, तो असली नुकसान वह नहीं करता, असली नुकसान हम खुद करते हैं उस घटना को बार-बार मन में दोहराकर। उस व्यक्ति को मन में बिठाए रखना मतलब उसे अपने भीतर रहने की जगह देना। और जो आपकी कद्र नहीं करता, वह आपके मन में रहने लायक भी नहीं। याद रखिए, जो व्यक्ति दूसरों को नीचा दिखाने में समय बिताता है, वह खुद अपनी हीन भावना से ग्रस्त होता है। उनके व्यवहार को अपने मन में जगह देना मतलब उनकी हीनता को अपने भीतर स्थान देना।
निष्कर्ष: आज के युग में कबीर का संदेश
जब पूरी दुनिया आपको अपने मन में भरने को कह रही हो, गुस्सा भरो, नफरत भरो, बदले की भावना भरो, ईर्ष्या भरो, तब कबीर कहते हैं, खाली करो, उतार दो। कबीर की उलटी मार आज के संदर्भ में यह सिखाती है: जितना लोग आपको नीचा दिखाने की कोशिश करें, उतना ही आप उन्हें अपने मन से उतार दें। उनकी बातों का जवाब मत दो, उनसे बहस मत करो, बस उन्हें अपने चित्त से विदा कर दो। क्योंकि आपके मन की जगह कीमती है, और उसे उन लोगों के लिए बर्बाद नहीं करना चाहिए जो आपकी कद्र नहीं करते। असली शक्ति यह नहीं है कि आप किसी को जवाब दें या उसे नीचा दिखाएं। असली शक्ति यह है कि आप इतने मजबूत हो जाएं कि वे आपके मन को छू भी न सकें। यही कबीर की चित से उतार देने की सच्ची कला है। मन को निरंतर खाली करते रहना, ताकि वह हमेशा ताजा रहे, नया देख सके, नए सिरे से सोच सके, यही कबीर की साधना है। तभी असली समझ आती है, तभी असली स्वतंत्रता मिलती है। कबीर का यह संदेश सदियों बाद भी उतना ही ताजा और प्रासंगिक है, क्योंकि मानव मन की मूल समस्या वही है, भरा हुआ होना, और उसका समाधान भी वही है, खाली हो जाना।

डॉ. पीयूष राजा, स्तंभकार, बिहार

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