यूट्यूब चैनल पर साहित्यिक-सांस्कृतिक एपिसोड : 45
बाल साहित्य बच्चों के मानसिक व नैतिक विकास का सशक्त माध्यम : सिद्धेश्वर

पटना।यूट्यूब चैनल पर फेसबुक के माध्यम से प्रसारित साप्ताहिक साहित्यिक-सांस्कृतिक एपिसोड–45 में वरिष्ठ रचनाकार सिद्धेश्वर ने कहा कि बाल साहित्य का मुख्य उद्देश्य बच्चों में मानसिक विकास, कल्पनाशीलता, संवेदनशीलता और मूल्यबोध का निर्माण करना है। उन्होंने कहा कि वही बाल साहित्य सार्थक है, जो मनोरंजन के साथ-साथ ज्ञान, विवेक और स्वस्थ चिंतन का बीजारोपण करे।
लाइव प्रस्तुति के दौरान सिद्धेश्वर ने कहा कि आज का बच्चा चाँद-तारों को केवल सुंदर वस्तु के रूप में नहीं, बल्कि विज्ञान की उपलब्धि के रूप में देखता है। वह प्रकृति को वैज्ञानिक तथ्यों और पर्यावरणीय चेतना से जोड़कर समझता है तथा परिवार और समाज की गतिविधियों को गहराई से महसूस करता है। नई पीढ़ी प्रगतिशील सोच और तार्किक दृष्टि के साथ संसार को देखना सीख रही है।
खुले मंच के अंतर्गत राज प्रिया रानी ने अपनी एक लघुकथा एवं कविता प्रस्तुत की। वहीं आशीष आनंद (विज्ञान व्रत), सपना चंद्रा एवं सिद्धेश्वर की कलाकृतियाँ भी प्रदर्शित की गईं।
आमने-सामने खंड में वरिष्ठ लेखिका डॉ. अनीता पंडा से ऑनलाइन भेंट-वार्ता हुई। उन्होंने कहा कि बाल साहित्य बच्चों के लिए एक महत्वपूर्ण संसाधन है, जो उन्हें जीवन के विविध पहलुओं से परिचित कराता है और उनके सर्वांगीण व्यक्तित्व विकास में सहायक होता है।
उन्होंने कहा—
“बाल कविता लिखना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। बच्चों के लिए लिखने हेतु लेखक को स्वयं बच्चे जैसा सरल, संवेदनशील और निष्कपट बनना पड़ता है। आज प्रस्तुत अधिकांश बाल कविताएँ बच्चों की मानसिक ऊर्जा बढ़ाने में सक्षम प्रतीत हुईं।”
इसके बाद पत्रिकानामा खंड के अंतर्गत राजेश शुक्ल के संपादन में प्रकाशित 16 पृष्ठों की लघु ई-पत्रिका ‘वातायन प्रभात’ की समीक्षा प्रस्तुत की गई, जिसे साहित्य की एक संपूर्ण पत्रिका बताया गया।
सिद्धेश्वर की महफ़िल के अंतर्गत कबीरदास, मिर्ज़ा ग़ालिब, दाग़ देहलवी, रहीमदास एवं मीरा बाई की प्रसिद्ध रचनाओं का पाठ प्रस्तुत किया गया।
अपनी शायरी प्रस्तुत करते हुए सिद्धेश्वर ने कहा—
“हमने ख़ामोशी से सीखा है बोलना,
भीड़ में रहकर भी तन्हा रहना।
जो दिल से उतरा वही शेर बना,
वरना अल्फ़ाज़ तो हर कोई लिख लेता है।
नफ़रतों के शहर में मोहब्बत का पता,
हमने हर ज़ख़्म से पूछकर लिखा।”
आर. पी. घायल ने अपनी प्रस्तुति “अभी भी है अज़ीमाबाद की ख़ुशबू, इसी पटना को पहले अज़ीमाबाद कहते थे” के माध्यम से श्रोताओं को भावविभोर किया।
वहीं प्रीति सुमन ने अपनी शायरी में कहा—
“ज़रा-सी मरहम भी साथ रख लो,
मिलेंगे काँटे भी सफ़र में।”
सोशल मीडिया पर लाइव प्रसारण को लेकर प्रणय सत्यार्थी ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा—
“सिद्धेश्वर की डायरी एपिसोड साहित्य, समाज और तकनीक के बदलते परिवेश में मनुष्य की संवेदनशीलता को बचाए रखने का संदेश देता है—काग़ज़ की ख़ुशबू और कलम की ऊष्मा ही साहित्य को जीवित रखती है।”
कार्यक्रम के अंत में अयोध्या कवि सम्मेलन की विस्तृत जानकारी भी प्रस्तुत की गई।
( प्रस्तुति :बीना गुप्ता)



