आधुनिक भारत की नींव का पत्थर:सावित्रीबाई फुले का क्रान्तिदर्शी विमर्श और आधुनिक प्रासंगिकता
डॉ.बी.गीतारानी

(3 जनवरी भारत की प्रथम महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले की जयंती के संदर्भ में)
शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय,
हुस्सैनी आलम्, हैदराबाद, तेलंगाना राज्य।
सावित्रीबाई फुले,जिनका जन्म 3 जनवरी 1831 को हुआ,केवल भारत की प्रथम महिला शिक्षिका नहीं थीं। वह भारतीय समाज में उस युग की क्रांति थीं, जब शिक्षा, समानता और मानवीय गरिमा जैसे शब्द विशिष्टाधिकार हुआ करते थे। उनका जीवन और कार्य एक ऐसा विश्लेषणात्मक लेख है जो हमें आज के भारत की सामाजिक और राजनैतिक चुनौतियों का सामना करने की प्रेरणा देता है।
शिक्षा:विरोध की आग में प्रज्वलित मशाल (सन् 1848 का क्रान्तिकारी कृत्य)
सावित्रीबाई फुले ने 1848 में पुणे में अपने पति महात्मा ज्योतिबा फुले के साथ मिलकर बालिकाओं के लिए जो प्रथम विद्यालय स्थापित किया, वह केवल एक संस्था नहीं थी; वह ज्ञान के लोकतंत्रीकरण का पहला घोषणापत्र था।
आधुनिक प्रासंगिकता:
लिंग और जातिगत विषमता: सावित्रीबाई ने यह विद्यालय ऐसी छात्राओं के लिए खोला था जो विभिन्न जातियों से आती थीं। आज भी, देश के ग्रामीण और उपेक्षित समुदायों में लड़कियों का शिक्षा छोड़ना एक बड़ी चुनौती है। उनका संघर्ष हमें याद दिलाता है कि शिक्षा का अधिकार केवल नियम नहीं,बल्कि सामाजिक न्याय का एक अस्त्र है।
शिक्षा का निजीकरण और लाभ: जब उन्हें विद्यालय जाने के लिए पत्थर और गंदगी झेलनी पड़ी, तो यह उस पितृसत्तात्मक और रूढ़िवादी मानसिकता का सीधा विरोध था जो यह मानती थी कि ज्ञान पर कुछ वर्गों का एकाधिकार है। आज, जब गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुँच एक वर्ग विशेष के लिए सिमटती जा रही है, तो सावित्रीबाई की वह लड़ाई प्रासंगिक हो जाती है, जिसमें उन्होंने शिक्षा को हर बच्ची के लिए सुलभ बनाने हेतु व्यक्तिगत जोखिम उठाया।
‘दोषी ठहराने’ की संस्कृति पर आघात: उनका अपने थैले में एक अतिरिक्त साड़ी लेकर चलना (ताकि विद्यालय पहुँचकर गंदी हुई साड़ी बदली जा सके) यह दर्शाता है कि उन्होंने समाज की हिंसा को अपने लक्ष्य के मार्ग की बाधा नहीं बनने दिया। यह आज के कार्यकर्ताओं को सामाजिक उत्पीड़न के सामने न झुकने का एक शक्तिशाली पाठ है।
जातिवाद पर प्रहार: जल और जीवन का अधिकार
सावित्रीबाई फुले ने केवल लिंग के आधार पर नहीं, बल्कि जाति के आधार पर भी समानता की वकालत की। उन्होंने और उनके पति ने अपने घर में एक कुआँ खुदवाया ताकि दलित और नीच जाति के लोग भी बिना रोक-टोक पानी ले सकें।
आधुनिक प्रासंगिकता:
दलित और जल का संकट: भले ही आज विधि बदल गए हों, लेकिन देश के कई हिस्सों में आज भी सार्वजनिक जल स्रोतों तक दलितों की पहुँच को लेकर सामाजिक बहिष्कार और हिंसा की खबरें आती हैं। सावित्रीबाई का कुआँ, इसलिए, केवल एक भौतिक संरचना नहीं है,बल्कि सामाजिक समावेशन का एक अटल प्रतीक है।
अखंड भारत का दर्शन: उन्होंने लोगों को समझाया कि सभी लोग “भाई-बहन की तरह हैं” और अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा देने की बात कही। यह विचार आज भी भारतीय समाज के लिए एक चुनौती है, जहाँ जातिगत पहचान और विवाह के प्रश्न पर अक्सर प्रतिष्ठा के लिए हत्या (ऑनर किलिंग) या सामाजिक बहिष्कार जैसी घटनाएँ होती हैं।
नारीवादी नेतृत्व और देह की स्वायत्तता
सावित्रीबाई फुले भारत के नारी मुक्ति आंदोलन की प्रथम नेता थीं। उन्होंने विधवाओं के बाल मुंडवाने (सिर के बाल मुंडवा देना) जैसी अमानवीय प्रथाओं का मुखर विरोध किया।
आधुनिक प्रासंगिकता:
महिला की गरिमा और अभिकरण: विधवाओं के लिए सन् 1854 में आश्रय गृह खोलना और नाइयों को समझाकर इस प्रथा को समाप्त करने का प्रयास करना, आधुनिक नारीवाद की अवधारणाओं से जुड़ा है। यह शारीरिक स्वायत्तता, सम्मान और उस सामाजिक नियंत्रण का विरोध था जो महिला के शरीर को ‘पति की संपत्ति’ मानता था। आज के संदर्भ में, यह महिला की चयन की स्वतंत्रता और देह की स्वतंत्रता के लिए चल रहे संघर्षों से सीधे जुड़ता है।
आपदा प्रबंधन और सामाजिक सेवा: सन् 1897 में जब पूरे महाराष्ट्र में प्लेग फैला, तो सावित्रीबाई ने स्वयं प्रभावित क्षेत्रों में जाकर लोगों की सहायता की, और इसी दौरान वह खुद भी प्लेग की शिकार होकर शहीद हो गईं। यह निस्वार्थ सेवा, विशेष रूप से महामारी के काल में, समाज सेवक की भूमिका और नागरिक उत्तरदायित्व का सर्वोच्च उदाहरण है।
सत्यशोधक समाज: तर्क और मानवता का आह्वान
सावित्रीबाई फुले ने सत्यशोधक समाज के माध्यम से अंधविश्वास, पंडितों के प्रभुत्व और कर्मकांडों का विरोध किया। उन्होंने तर्क और मानवता के आधार पर शादियाँ (बिना पंडित या पुजारी के) करवाने को बढ़ावा दिया और दहेज लेने-देने का विरोध किया।
आधुनिक प्रासंगिकता:
तर्कवाद की आवश्यकता: 18वीं शताब्दी की उनकी यह तर्कवादी विरासत आज भी महत्वपूर्ण है, जब समाज में अंधविश्वास, धार्मिक कट्टरता और तर्कहीनता हावी हो रही है। सत्यशोधक समाज का कार्य आज की युवा पीढ़ी को विज्ञान, तर्क और मानवतावाद के मूल्यों पर आधारित समाज के निर्माण के लिए प्रेरित करता है।
नैतिक नेतृत्व: 1890 में अपने पति की मृत्यु के बाद, सभी सामाजिक मानदंडों को तोड़ते हुए उन्होंने ज्योतिराव की चिता को अग्नि दी। यह प्रतीकात्मक कदम था जिसने पितृसत्तात्मक समाज को चुनौती दी और यह स्थापित किया कि सामाजिक भूमिकाएँ लिंग पर आधारित नहीं हो सकतीं। यह नेतृत्व का एक ऐसा उदाहरण है जो आज भी महिलाओं को परम्पराओं से ऊपर उठकर अपनी भूमिका निश्चित करने का अधिकार देता है।
निष्कर्ष: सावित्रीबाई फुले – एक सतत क्रान्ति
सावित्रीबाई फुले का जीवन एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि एक आधुनिक प्रतिरूप है। उनका त्याग, विरोध सहन करने की उनकी क्षमता, और शिक्षा एवं समानता के प्रति उनका अटूट विश्वास, आज के भारत की उन चुनौतियों (जातिवाद, लिंगभेद, असमानता) का सामना करने का मूलमंत्र है जिनसे हम आज भी जूझ रहे हैं। उन्हें याद करना केवल इतिहास को दोहराना नहीं है, बल्कि उनके सिद्धांतों (समानता, तर्क, निस्वार्थ सेवा) को वर्तमान सामाजिक संघर्षों में क्रियान्वित करने का एक आह्वान है।
डॉ.बी.गीतारानी
असिस्टेंट प्रोफ़ेसर(हिन्दी)
शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय,
हुस्सैनी आलम्, हैदराबाद, तेलंगाना राज्य।




