
अट्टालिका यानी भौतिकवादी तरक्की का पैमाना, विकास की गति का पैमाना, शहरीकरण और शहरी संस्कृति का पैमाना।
दुबई घूमकर आयी एक सखी इठलाकर कहती हैं.. मज़ा आ गया,क्या हाई राइज़ मतलब अट्टालिकाएं हैं ..यार ऊॅंची-ऊॅंची इमारतें देखकर दिल ख़ुश हो गया।
इसमें कोई शक़ नहीं कि दुनियाॅं में देखने लायक बहुत कुछ है लेकिन अपने देश में भी ऊॅंची-ऊॅंची अट्टालिकाएं शान से खड़ी होकर ग्रामीण सभ्यता को मानो मुॅंह चिढ़ाती-सी प्रतीत होती हैं। मेरा तो मानना है कि ऊॅंची-ऊॅंची अट्टालिकाओं ने लोगों को ऊॅंचाई तो दे दी मगर सोच संकुचित हो गई। असल में लोग अपने-अपने फ्लैटों में क़ैद हो गए। हर घर के दरवाज़े दिनभर बंद रहते हैं।नीचे के फ्लैट में क्या हो रहा है यह ऊपर के फ्लैट में रहने वाले को पता भी नहीं होता।
बाहर से ऊॅंची-ऊॅंची अट्टालिकाएं मगर भीतर संकुचित होते लोग और फिर उसी पुराने गांव के जीवन को जीने के लिए हम जाते हैं गांव की थीम बेस्ड रिजॉर्ट्स में !!!
मुझे याद है हमारा बरेली वाला घर… चौताल
में सर्दियों में एक मूंज की खटिया डली रहती थी जिस पर कभी कचरी-पापड़ सूखते,कभी मम्मियां स्वेटरों को बुनते हुए आपसी सुख-दुःख सांझा करतीं,कभी वहीं संतरे छीले जाते,गेट के आगे से गुजरते परिचित वहीं दो मिनिट रुक कर हालचाल भी पूछ लेते और दो फाॅंकें संतरे की भी मुॅंह में डाल लेते।।कभी हम सखियाॅं मिलकर आधी किलो मूंगफली चट कर जाते, हज़म भी हो जाती,अब तो मूंगफली कोलेस्ट्रॉल बढ़ाने लगती है..डॉ कहते हैं!!!उसी खटिया पर रेडियो पर गाने चलते रहते और हम अपनी ज्वाइंट स्टडीज भी कर लेते।
हमारे ही नहीं,हमारे एरिया के हर घर की यही सीधी-सादी कल्चर हुआ करती थी।उस देसी या आउटडेटेड माहौल में जितना कुछ हासिल किया वो कस्टमाइज्ड सोफे पर बैठकर हासिल नहीं हुआ।
मगर अब न तो जगह बची है,न ही इतनी बड़ी जेब कि आप ज़मीन खरीदकर घर बनवा सके बल्कि मैंने तो अपने आसपास के लोगों को अपने दुतल्ला घरों को तुड़वाकर अट्टालिका बनाते हुए देखा है।झोले भर इनकम भी होती है और अपने दो/तीन फ्लैट मुफ़्त।
शहरों की बात तो छोड़ ही दीजिए,कस्बों में भी घरों का स्थान अट्टालिकाएं ले रहीं है और राज़ की बात बताऊॅं कि आपसे बड़ा आपकी अट्टालिका का कद होता है।आप किस डेवलपर की बनाई अट्टालिका के वाशिंदे है इस आधार पर लोग आपकी हैसियत भी आंक लेते हैं।
है न ग़ज़ब की बात!!!
मगर अट्टालिकाओं में निवास के कुछ फ़ायदे भी है यथा सुरक्षा,सामाजिक परिवेश,फैमिली फ्रेंडली माहौल,बच्चों की प्ले एरिया,बुजुर्गों के घूमने -फिरने का सुरक्षित पैसेज, सैलून,प्ले स्कूल, कहीं कहीं बैंक्स,मिनी बाज़ार,पार्टी हॉल आदि आदि।
मगर इस अट्टालिका कल्चर के लिए बहुत बड़ी कीमत चुकाई जा रही है।पेड़,पहाड़,झील, तालाब,पशु-पंछियों के आशियाने,प्राकृतिक सौंदर्य सबकुछ तहस नहस हो रहा है,इको-बैलेंस बिगड़ रहा है,
विटामिन डी की कमी से लोग जूझ रहे हैं क्योंकि अट्टालिकाओं में अक्सर धूप का प्रवेश कम ही होता है।
फिर भी हम कहते हैं कि हर तरक्की कर रहे है।
ज़रा सोचिएगा!!
मधु माहेश्वरी गुवाहाटी असम ✍️ ✍️




