साहित्य

आदिवासी सृजन मसीहा डॉ रामशंकर चंचल

डॉ रामशंकर चंचल

इतिहास रचना
कोई आसान बात नहीं
आदिवासी सृजन मसीहा
जैसे सम्मान पर दस्तक देना
जीवन में कोई भी
किसी भी कर्म पथ पर दस्तक दे
मसीहा जैसे अद्भुत सम्मान से
शब्द से नवाजा जाय
यह उपलब्धि का
हर पल, वर्ष , कितना
परिश्रम लगन और मेहनत का
होगा , कितने त्याग और
साधना और तपस्या का होगा
वहीं जानता है

जो यह अनमोल, कालजयी
शब्द से नवाजा गया
कितनी रातें जागा होगा
कितना दर्द, पीड़ा को
खामोशी से अकेले
सहा होगा
जितना लिखा जाए
कम होगा
हर लिखा हुआ
उसके कर्म पथ पर
निष्ठा लगन और आत्मा विश्वास से
छोटा होगा
यह सत्य केवल
वहीं साधक
जानता है
जिसने सारा जीवन
सैकड़ों सुख सुकून
त्याग कर जीवन की
कुर्बानी
किसी आनेवाले कल के लिए
समर्पित की
जिसने देश और दुनिया को चौका दिया और खुद का सुख सुकून
त्याग दिया
खुद के लिए
जीता आदमी आज
तब वह हर पल
रात दूसरों के सुख
के लिए
आवाज उठता हुआ
जीता है बिना कोई
चाह के , इच्छा के
सच तो यह है कि
वह ईश्वर कृपा ही है कि
अपने जीवन में नेक कर्म पथ
से वह कभी डगमगाया नहीं
सैकड़ो खुशियां , सुख और समृद्धि
से सदा अंजान बना रहा
इन सैकड़ों त्याग के बाद
उसे केवल नसीब होता हैं
मसीहा जैसे शब्द
उसी को जीवन मान
सुखद अहसास करता हुआ
जीवन व्यतीत कर
सुख ,सुकून पाता है
भाग्य से कोसों दूर
सदा ही कर्म करते हुए
सारा जीवन व्यतीत करना
कहां आसान है
यूं ही नहीं ऐसे लोग
महान शब्द से नवाजा जाते
सच कहूं तो उनकी
पीड़ा तब मुखर होती
जब उनके मुंह से निकल
अंत समय यह शब्द आता है
है ईश्वर कुछ भी बना देना
पर दुबारा यह जीवन
मत देना
इतने त्रासदी लिए
शब्द यूं ही नहीं
निकल आते हैं
किसी भी व्यक्ति से
खैर, लिखना था
लिखा गया ईश्वर ने चाहा बस
उस व्यक्ति की अद्भुत
साधना और तपस्या पर
जिसे कुछ केवल
इतना कहकर
टाल जाती है
अरे,नसीब में था उसके
जबकि नसीब जेसे
शब्द
किसी के लिए
मसीहा शब्द का
निर्माण नहीं करते
यह परम सत्य
केवल वहीं व्यक्ति जानता
जो मसीहा जैसे शब्द से
सम्मानित है
डॉ रामशंकर चंचल
झाबुआ मध्य प्रदेश

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