साहित्य

आह भरे

शेख रहमत अली "बस्तवी"

 

मेरी कविताएँ आह भरे,
तन-मन में जैसे प्रवाह करे।
कोमल काया मन चंचल है,
कर्तव्यों का निर्वाह करे।।
देश के अपने प्यारों से
उन हाकिम ठेकेदारों से,
मज़हब तो पूछो फूलों का
जिनसे है शान शिवालों के।
फूलों ने नहीं पूछा तुमसे
जो सभी धर्म को जोड़े हैं,
बिन भेद-भाव के सदियों से
इक रिश्ता-नाता जोड़े हैं।
उम्मीद यही जन-मानस से,
फ़िर से ना कोई गुनाह करे।
कोमल काया मन चंचल है,
कर्तव्यों का निर्वाह करे।

सुन ऊंच-नीच क्यों करता है
भारत क्या तेरा अकेला है,
ये खून की होली मिलकर
हर भारतवासी ने खेला है।
जब चले लेखनी गरज उठे
मन व्याकुल होकर तड़प उठे,
छलके आंसू इन पलकों में
चेहरे की रंगत महक उठे।
लिखना चाहें जो गायों पर
भूंखी-प्यासी उन माओं पर,
है बड़ा प्रेम प्रकृति से भी
अब रोक लगे हत्त्याओं पर।
दरिया को इक दिन मिलना है
सागर से फ़िर भी आह भरे,
कोमल काया मन चंचल है
कर्तव्यों का निर्वाह करे।

क्यों धर्म-धर्म पर बांट रहे
रिश्तों के धागे काट रहे,
सरकारी सब सुविधाओं को
ख़ुद लेकर हमको डांट रहे।
क्यों मुल्ला, पंडित करते हो
कुदरत से भी ना डरते हो,
क्या विश्व गुरु बन पायेंगे
लोगों में नफ़रत भरते हो।
जहाँ अब्दुल वीर हमीद हुए
जहाँ तुलसी संत कबीर हुए,
गौरवशाली भारत की धरा
रहिमन जस जहाँ फ़कीर हुए।
सौहार्द बनाओ मिलजुल कर
की सारी दुनिया वाह करे,
कोमल काया मन चंचल है
कर्तव्यों का निर्वाह करे।

शेख रहमत अली “बस्तवी”
बस्ती ( उ. प्र.)
7317035246

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