साहित्य

आरजू की दर्द

उदय किशोर साह

जल में तैरते मीन को    तड़पते देखा
गीली लकड़ी भी हम  को जलते देखा
बुढ़े को कोल्हू में जब      पीसते देखा
नोनीहाल को भूख से   बिलखते देखा
युवा को मदिरा की जाम में डूबते देखा
पत्थर को पर्वत पे लुढ़कते भी    देखा
पत्नी को पतिदेव पे गरजते    मैं देखा
वृद्ध माँ बाप को वृद्धाश्रम में रोते देखा
पर्णकुटी पे हो रहे अत्याचार को देखा
रईसजादे को खुमार से बिगड़ते देखा
रसूखदार को मृत्यु शैय्या पे मरते देखा
अभिमानी को जमीं पे गिरते भी देखा
आसमां से आग बरसते भी     मैं देखा
ऊँचे महल वाले को बैचेनी में भी देखा
नावालिग को मजदूरी से पेट भरते देखा
भ्रष्ट अफसरशाही को लुटते    भी देखा
निदोष् को कारागार में जाते भी  देखा
अपनों से अपनापन की भाव चुराते देखा
भाई भाई में दौलत के लिये टकराते देखा
धर्म के नाम पर बँटवारा की दर्द भी देखा
नेताओं को वादा खिलाफी करते    देखा
जनता को वोट दे पछताते भी        देखा
स्वार्थ की दीप की ऑजोर भी  सबने देखा
विकास के नाम पे राजकोष को बँटते देखा
प्रगति की नाम पे मृगतृष्णा को भी   देखा
गुरूदेव की आचरण को गिरते भी   देखा
आशा की किरण    को बुझते भी मैं देखा
झुठी इतिहास को रटाते भी मैं         देखा
नतागिरी की स्तर को बद् से  बद्तर देखा
बेवकूफ बनाने की राजनीति पे लुटते देखा

उदय किशोर साह
मो० पो० जयपुर जिला बांका बिहार

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