
अंधे के आगे रोना ,
और अपने नैना खोना,
दादाजी मुझे बताओ
क्यों इसको कहते रोना।
बात किसी को समझाओ
पर उसको समझ न आती,
उसी समय यह लोकोक्ति
हाँ, ठीक बैठ हैं जाती।
दादा बोले सुन मन से
कभी किसी को समझाए ,
यत्न बहुत करने पर भी
उसे नहीं समझा पाए।
तब तुझको कहना होगा
अंधे के आगे रोना
जानबूझकर चाहता हूँ
मैं अपने नैना खोना।
मुकेश कुमार दीक्षित ‘शिवांश’
चंदौसी
मो ०- 8433013409
दिनांक- 04-1-2026



