साहित्य

असुरक्षित हैं बेटियाँ

डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण

अपने घर की लाज बचातीहैं बेटियाँ।
बाबुल के आंगन में सदा मुस्काती है बेटियाँ।।

शिक्षितहोकर परिवार का नाम कमाती बेटियाँ।
दुल्हन बन ससुराल को सजाती है बेटियाँ।।

बेटा से कभी कम नहीं होती है बेटियाँ।
मात-पिता के हर दर्द को समझती है बेटियाँ।।

क्यो अत्याचार की शिकार होती है बेटियाँ?
तानो को सहकर बदनामी ओढ़तीं है बेटियाँ?

सोच कब बदलेगीसमाज की बेटियाँ के लिए?
लाज बचाने का डर हरदम सहतीं हैं बेटियाँ।।

जोर से बोलना हंसने पर बंधन में बेटियाँ?
सपनों पर पहरे नजरपे इल्जाम लेतीं है बेटियाँ।।

बोझ कभी नहीं रहीं भविष्य की रेखा है बेटियाँ।
सम्मान कीहकदार पर सम्मान देतींहै बेटियाँ।।

डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण
छतरपुर मध्यप्रदेश

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