साहित्य

जहाँ दया तहँ धर्म है, जहाँ लोभ तहँ पाप

विद्यावाचस्पति डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’

सुख दुःख का जिम्मेदार
इंसान स्वयं होता है,
सुर या असुर भाव मन में
स्वतः छिपा होता है,
बिचार ही हमे सज्जन
और दुर्जन बनाते हैं,
और हम इंसान से
शैतान बन जाते हैं।

जिन के मन में सबके लिए प्रेम है,
वह अनावश्यक गुस्सा नहीं करते हैं,
वही गलतियो को माफ़ कर सकते हैं,
सबके लिए मन में दया भाव होते हैं।

सज्जन व्यक्ति जहाँ भी होते हैं
ईश्वर सदा वहीं वास करते हैं,
जिनके मन में ईर्ष्या लोभ होता है
वही बहुत अधिक गुस्सा कर्रते हैं।

उनके मन में कभी किसी के लिए
कोई दया का भाव नहीं होता है,
उनके मन मंदिर में कभी ईश्वर का
शुभ व पवित्र निवास नहीं होता है।

क्रोध मनुष्य के पतन का कारक है,
ऐसे लोग अपने तामसी बिचारों के
कारण ही समाज का और स्वयं का
सिर्फ सदा अनहित ही करते रहते हैं।

क्रोध में व्यक्ति अपना
आपा खो देता है,
और फिर सही निर्णय
नहीं ले पाता है,
क्रोध काल बन उसके
सर नाचने लगता है,
और वह किसी पर भी
वार कर सकता है।

या फिर वह खुद का ही
नुकसान कर लेता है,
ऐसे लोगो के मन में
ईश्वर का वास नहीं होता,
पर जिनके मन में दया,
क्षमा की भावना होती है,
उनके मन में सदा ईश्वर
के प्रति श्रद्धा होती है।

इस कविता से इस बात
के मर्म को समझना है,
कि जिस व्यक्ति के मन
में दया व क्षमा भाव है,
उसके मन मंदिर में धर्म
क़र्म का निवास होता है,
आदित्य ईश्वर के प्रति
उसमें विश्वास होता है।

विद्यावाचस्पति डॉ कर्नल
आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’
लखनऊ

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