साहित्य

बचपन

डॉ.पुष्पा सिंह

अपना प्यारा बचपन
याद करती मैं हरदिन
छोटी-छोटी खुशियाँ
निथार लेती हूँ प्रतिदिन।

न फिक्र न चिंता
न लिंभेद न जाति धर्म
खुशियों में दिन बीतता
सब अपने थे सबके हम।

घर बड़ा मेरा भले था
एक कमरे में रहते ठाट,
चीजें कम भले रहती
खाते हम मिल बाँट।

डाँट सबमिल खाते थे
बनाकर खड़े कतार,
गलती करता कोई एक
रोते सारे हम पिटकर।

खट्टी-मीठी याद पुरानी
रोज गुदगुदाया करती है़ं,
बचपन वाली कई कहानी
हरदिन ही आ जाती हैं।

समय अब बदल गया
बढ़ गई दूरियाँ,
व्यस्त हो गए सब
सब की हैं मजबूरियाँ।
डॉ.पुष्पा सिंह

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