साहित्य

रंग गया मुझको वह रंग रसिया

नरेश चन्द्र उनियाल, "कमली कुंज"

फागुन का मधुमास जो आया,
होली का उत्सव संग लाया,
होल्यारों की मस्त टोलियां,
घूमें घर-घर गली नगरिया।

पनघट से पानी भरकर मैं,
सखियों के संग राह चली थी,
साँवरिया ने छेड़ दिया यूँ,
फोरि ही डारि मोरि गगरिया।

भर पिचकारी,मुझको जो मारी,
भाग न पाई मैं बेचारी,
बचते बचाते उस दुश्मन ने,
भिगा ही डारि मोरि चुनरिया।

अबीर ग़ुलाल रँगे हाथों से,
प्रीतभरी अपनी बातों से,
प्रीत के रंग से, अपने ही रंग में,
रंग गया मुझको वह रंग रसिया।

मुझको पिया का ही था बनना,
होली बन गई एक बहाना,
रँगकर मुझको अपने रंग में,
अपना कर गया वह साँवरिया।

नरेश चन्द्र उनियाल,
“कमली कुंज”
देहरादून, उत्तराखण्ड

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also
Close
Back to top button
error: Content is protected !!