
सृष्टि के निर्माण को, होती हैं बेटियाँ,
कूड़े के ढेर को नहीं, होती हैं बेटियाँ।
बेटों का क्या, घरबार बसाकर हुए अलग,
अवलम्ब तो माँ बाप का, होती हैं बेटियाँ।
देखा पिता को पुत्र से पिटते हुए मैंने,
पुचकार प्यार करने को, होती हैं बेटियाँ।
समझो न बेटियों को, निर्बल व पंगु तुम,
एवरेस्ट फतह करने को, होती हैँ बेटियाँ।
बेटे के इन्तजार में, दम तोड़ते हैं जो,
उनकी चिता जलाने को, होती हैं बेटियाँ।
जिस नाम को कुछ पुत्र, मिलाते हैं धूल में,
रोशन उसी ही नाम को, करती हैं बेटियाँ।
नरेश चन्द्र उनियाल,
“कमली कुंज”
देहरादून, उत्तराखण्ड।




