साहित्य

भौतिकता की अंधी दौड़

मधु वशिष्ठ

डर लगता है आज देखकर गृह सहायिकाओं पर सबकी निर्भरता,
अपने ही घर का सारा काम,
अपने ही घर की देखभाल कोई खुद ही क्यों नहीं कर सकता?

व्यस्तताएं इतनी हैं, घर के बच्चे और वृद्ध भी हैं अब गृह सहायिकाओं के हवाले,
समझ नहीं आता, अपने घर के संस्कार और अपने ही वृद्धों के प्रति सेवा भाव की जिम्मेदारी
कोई अनजान सहायक कैसे हैं ले सकता ?

भावनाओं को त्यागकर, व्यस्तताओं को ओढ़कर,
भौतिकता की अंधी दौड़ में दौड़कर,
यदि तू है जी सकता,
गृह सहायक क्यों नही केवल पैसे के लिए ही यह काम कर सकता ?

जवानी की दहलीज पार करके वृद्धावस्था की ओर हूं बढ़ता,
डर लगता है अब, बच्चे हैं व्यस्त,
सेवा भाव से मुक्त,
क्या अटेंडेंट के सहारे मैं खुद ही जीवन नहीं जी सकता?

बढ़ रहा है गृह सहायकों का चलन,
डर रहा है मेरा मन,
अब तो घर में घर के ही लोगों से खाना भी तो नहीं बनता।
भौतिकता की दौड़ में आगे जीवन कैसा होगा कोई बच्चा यह क्यों नहीं समझता?

मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा

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