साहित्य

बसंत

डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण

आसमां में लालिम से सुहानी शाम आई।
पुरानी अनकही बातों ने मन से कुछ कह पाई।
परिंदे लौट आए अपने बसेरों में यहाँ,
सुरमई झुरमुटों में कोयल ने तान सुनाई।।

सुरमई साज से सजती हैं‌वागेश्वरी
हंसवाहिनी धवल वस्त्र सोहती
पुस्तक पाणी कलम लेखनी,
आलोकित कर जग उजास भर देंती।

सुरमई शाम एक नगमा सुनाये
सुकून दिल को तभी आ जाये।
रूह को रूहानी मजलिश करे,
नील गगन की ओर ले जाये।

बसंती बयार बह रही है महक मोहती।
खो गया तनमन उसकी रंगत सोहती।
गेंदा गुलाब कुंद चारों ओर छा रहा,
सुरमई शाम को पलकों में बसा बैठती।।

डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण
छतरपुर मध्यप्रदेश

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