
रे बसंती हवा तुँ अल्हड़ हो दिवानी
पर्वत को छुकर मुड़ जाती हो मनमानी
अदृश्य रूप बना वन उपवन की हो रानी
सागर की लहरों पे खेलती हो महरानी
अरहर की डाली संग झूमती बन मवाली
पीपल की पत्तों को प्यार से हो सहलाती
सरसों की पीली फूल संग करे अठखेलियां
तेरे आगमन पर खिल उठती है सब बेलियां
फिजां में मस्ती की उड़ा रही हो मस्त वयार
तुम्हें पाकर कितना खुश है वो हरसिंगार
वन उपवन की हो संजीवनी की एक संसार
ऋतुराज के संग संग आती हो धरा पे हर वार
कितना मनभावन पावन है बसंत ऋतु परिवार
हल्की हल्की सिरहन दे जतलाती हो आभार
नव पल्लव से सज गई तरूवर का दरबार
मेरे भी घर आना बन कर दुल्हन मेरे दिलदार
रंग बिरंगें फूल दशो दिशा में तुमने है खिलवाई
वातावरण में मदमस्ती की नशा तुमने मिलवाई
तेरे चाहत में पाँव पावड़े बिछाई है सारा संसार
अगले साल भी तुम आना ओ बसंती बन बयार
उदय किशोर साह
मो० पो० जयपुर जिला बांका बिहार




