साहित्य

चंदा

प्रिया काम्बोज प्रिया

कभी इष्ट बन त्यौहार में पूजता है तूं
कभी बच्चों का  चंदा मामा बनता है तू

प्रेमी युगलों का .. प्रियतम..दिलबर है तू ,
कभी सनम,कभी महबूबा,कभी बेवफा बनता है तू

इसी मस्ती में चूर कितना इठलाता है तू
कभी प्रेमियों के दीदार का दर्पण है तू

कभी विरह वेदना का …..सहारा है तू
कभी प्रियतम सा इंतजार कराता है तू

कभी इष्ट बन त्यौहार में पूजता है तूं
कभी बच्चों का चंदा मामा बनता है तू

जलवा अपना दिखा पूर्णिमा का चांद बनता है तू
कभी मिलन का साक्षी शीतल छाया है तू

रुप है तेरा निराला प्रियतम सा बादल में छुपता है तू
न रहता एक समान कभी घटता फिर बढ़ता है तू

मत इतरा तू इतना यूं ही चक्कर लगाता है तू
खूब सूरती जितनी पूनमचांद में समायी

उतना ही बदसूरत अमावस्या में है तूं
बन भोले का शीश मुकुट बड़ा खुशनसीब है तू

कभी इष्ट बन त्यौहार में पूजता है तूं
कभी बच्चों का भी चंदा मामा बनता है तू

   प्रिया काम्बोज प्रिया, सहारनपुर उत्तर प्रदेश

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