
चांदी अम्बर छू रही, चमक बढ़े दिन-रात।
सोना उसके साथ में, कहता अपनी बात।
कहता अपनी बात, रजत मुख पीछे करता
पहले आगे शान, मूल्य तब लिए बढ़ाए।
मिला नहीं सम्मान, तभी तो नीचे आए।
उषा बताती मार्ग, मोह की मत रह बांदी।
चाहे जितना मोल, रहे तज दें सब चांदी।
चांंदी से चांदी चढ़े, आसमान की डोर।
छूती आसमान जब, मिलती कभी न ठौर।
मिलती कभी न ठौर, शोर कर ती है भारी।
जन में हाहाकार, चलाती हद पे आरी।
उषा कहे यह बात, धयान में रखना मांदी
करे नहीं शुभ काम, तीव्र होती जब चांदी।।
डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण
छतरपुर मध्यप्रदेश




