साहित्य

छात्र का गुण

जयचन्द प्रजापति 'जय'

छात्र को सरलता से युक्त
नम्रता का भाव रखना चाहिए

मृदु वाणी कंठ से निकले
श्रध्दाभाव हो विद्या ग्रहण करने में

गुरु के प्रति निर्मल भाव हो
कटुवचन न निकले मुख से

एकाग्रता हो सीखने में
प्रेम, दया भरा हो ह्दय में

ऐसा होने पर गुणी होगा वह छात्र
यश का साम्राज्य फैलेगा चहुंओर

जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज

छात्र के गुणों का भावार्थ
…….
जयचन्द प्रजापति ‘जय’ की इस कविता में छात्र के आदर्श गुणों का मार्मिक वर्णन किया गया है। छात्र को सरलता और नम्रता से युक्त होना चाहिए, जिसकी मृदु वाणी से कठोर शब्द कभी न निकलें। विद्या ग्रहण में श्रद्धा और एकाग्रता होनी चाहिए, गुरु के प्रति निर्मल भाव रखना चाहिए तथा हृदय में प्रेम व दया का भाव समाहित होना चाहिए। ऐसे गुणी छात्र को यश का साम्राज्य चारों ओर फैल जाता है। यह कविता छात्रों को नैतिकता, अनुशासन और मानवीय मूल्यों की प्रेरणा देती है।

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