साहित्य

छुआछूत

नन्द किशोर बहुखंडी

छुआछूत की दीवारें, क्यों इतनी ऊंची हैं?
हमारे बीच की दूरी, क्यों इतनी बढ़ी हैं?

क्यों हम अलग-अलग हैं, क्यों हम बंटे हुए हैं?
क्या हम एक ही माता की संतान नहीं हैं?

छुआछूत की आग में, लोग जलते हैं।
अपने ही हाथों से, खुद को चोट पहुँचाते हैं।

क्यों हम भूल गए हैं, अपने संस्कारों को?
क्यों हम भूल गए हैं, अपने धर्म को?

हमारे हाथों में है, एक ही खून का रंग।
हमारे दिलों में है, एक ही प्यार का संग।

हमारे समाज में, क्यों इतनी बुराइयाँ हैं?
क्यों हम एक दूसरे को, इतना दर्द पहुँचाते हैं?

क्या हम भूल गए हैं, मानवता के धर्म को?
क्या हम भूल गए हैं, अपने ही इमान को?

प्रभु राम ने जब दलित शबरी के झूठे बेर खाए थे।
समाज को छुआछूत न मानने का संदेश बड़ा दिए थे।

फिर क्यों आज मानव, छुआछूत में उलझा हुआ?
कृष्ण यदुवंशी थे पर, युगों से उनको पूजा जाता।

आओ सब मिलकर, इस दीवार को गिराएँ।
आओ सभी मिलकर, एकता का झंडा उठाएँ।

आओ आवाज़ उठाकर, अपने समाज को बदलें।
इक्कीसवीं सदी में, अपने देश को आगे बढ़ाएँ।

मंत्र सदा याद रखें, हम एक हैं, हम एक हैं।
भारत माता की हम सभी, संताने हैं।

नन्द किशोर बहुखंडी
देहरादून, उत्तराखंड

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