साहित्य

चुप्पी

सुमन बिष्ट

जब सच की राह बुलाती है
तब चुप्पी बोझ बन जाती है,
जब अन्याय सिर चढ़ बोलता है
तब हर सांस सवाल बन जाती है।

जब सहना आदत बन जाए
तब पीड़ा ज़हर बन जाती है,
जब होंठ सिल कर बैठे जाते
तब चीखें भीतर चिल्लाती है।

जब कलम स्याही चुप हो जाए
तब इतिहास शर्मसार होता है,
जब शब्दों में सच की धार आये
तब भविष्य का द्वार खुलता है।

जब खाली पेट भी बोल उठे
तब हर सीमा टूट जाती है,
जब झोपड़ियों से आह उठती
तब वो महलों से जा टकराती है।

जब डर की दीवारें गिरती हैं
तब हिम्मत साथ निभाती है,
जब एक आवाज़ उठती है
तब लाखों में जान भर जाती है।

जब कविता मात्र शृंगार नहीं
तब ये भी क्रांति बन जाती है,
जब स्याही सुर्ख लहू बन जाए
तब क़िस्मत रेखा मिट जाती है।

जब मौन विकल्प नहीं होता
तब संघर्ष कहानी सुनाती है,
जब खड़े हो सच्चाई के संग
तब वही मशाल बन जाती है।

इसलिए उठो और बोलो सच तुम
तेरी हर चुप्पी आज गुनाह है,
जब तक हैं सूरज,चाँद, सितारे
तब तक सच से ही पहचान है।

सुमन बिष्ट, नोएडा

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