साहित्य

देश की मिट्टी

डॉ गीता पांडेय "अपराजिता"

लगे देश की मिट्टी प्यारी, महिमा बड़ी अपार।
चंदन बनकर महक रही है,हरपल इस संसार।।
इसकी रक्षा हर पल करना, बनें नहीं गद्दार।
सार छिपा कण-कण में इसके,करें सदा सत्कार।।

वीरों के यह रक्त सनी है,किए निछावर प्राण।
जज्बा जोश अपार भरा था,किए शत्रु निर्वाण।।
जब तक सांँस चली वीरों की,किए मातु परित्राण।
इनकी त्याग तपस्या से ही,होता है कल्याण।।

राम-कृष्ण की पुण्य धरा है, यहीं बसा कैलाश।
घूम-घूम कर निशाचरों का, करते प्रभुवर नाश।।
सूरज चंदा गगन सितारे,देते हमें प्रकाश।
चला वक्त के साथ मनुज जो, छूता वह आकाश।।

बहे बसंती पवन यहांँ पर, पंछी करते रोर।
धानी चूनर वसुधा ओढ़े, सुखद सुहानी भोर।।
भंँवरे कलियों संग प्रफुल्लित, बंँधी नेह की डोर।
कल-कल करती नदियांँ बहती,झरने करते शोर।।

पावन माटी बहुत हमारी,इसे लगा लो भाल।
सोंधी खुशबू इसकी भाती, रखती है खुशहाल।।
बनकर देश भक्त माटी के, होते लाल निहाल।
कभी आँच यदि माँ पर आती, बन जाते हैं ढाल।।

डॉ गीता पांडेय “अपराजिता”
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश

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