साहित्य

संजय मृदुल

जो तुम्हारा है तुम्हें वापस देता हूं

जो तुम्हारा है तुम्हें वापस देता हूं
नाशुक्र नहीं हूं अहसान नहीं लेता हूं।
तुमने धरती चीर दी पानी के लिए
मैंने नमक मिला दिया पानी में
तुम जो भी चोट देते हो सृष्टि को
मैं ब्याज समेत लौटा देता हूं।
तूफ़ान, सुनामी, बाढ़ सब मेरे रूप
मैं हर बूंद की कीमत रखता हूं
तुम बांध बनाते हो नदियों पर
मैं नदी को सागर बना देता हूं।
रूप बिगाड़ते तुम जानबूझकर
कचरा, केमिकल, गन्दगी डालकर
तालाब, झरने, नदियां, झील सबमें
मैं क्रोध में सबको सुखा देता हूं।
मैं जल का हूं रखवाला, ओ मनुष्य
मैं बूंद बूंद की परवाह करता हूं
तुम प्यासे न मर जाओ किसी दिन
बस यह सोच कर कृपा करता हूं।
तुम्हारी हर गलती को मन मारकर
हर बार जाने क्यों क्षमा करता हूं
खोखला कर रहे धरा को तुम
ये देख कर भी चुप रहता हूं।
तुम जोंक सरीखे चूस रहे हो जल
छलनी कर रहे धरती का सीना
चेतावनी समझ सतर्क हो जाओ
वरना यह श्राप तुम्हें मैं देता हूं।
फ़िर भरो सब नदिया, झरने
फ़िर सहेजो कुंए और ताल तलैया
हर बूंद को मानो अमृत सा दुर्लभ
तुम्हें बचाने को सीख यह देता हूं।
©संजय मृदुल

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also
Close
Back to top button
error: Content is protected !!