साहित्य

धनवान पत्नी

मधु वशिष्ठ

हे परमात्मा बस इतनी सुन ले
पत्नी मिले धनवान।
जाऊं जब भी ससुराल में अपने खूब बने पकवान।
आगे पीछे मेरे पूरा घर डोले,
कुंवर साहब सब मिलकर बोलें,
हीरे मोतियों से मुझको तोलें
बढ़ जाए फिर मेरी भी शान।

स्कूटी के पैसे मैं जोड़ ना पाया
पर लंबी कार को मन ललचाया।
किराए के घर में रहता आया
काश दे दे ससुर जी एक बड़ा सा मकान।
फूटी कौड़ी मेरे पास नहीं है
बैंक में भी कुछ खास नहीं है।
तनख्वाह की भी कोई आस नहीं है।
सब सपने पूरे हो जाएं यदि पत्नी मिले धनवान।

वाह कितनी अच्छी किस्मत थी मेरी।
जैसा सोचा वैसा था पाया।
घर जमाई बनकर बड़े से बंगले में मैं था आया।
सुन ली परमात्मा ने जब मेरी। तो लगा यूं मानो लॉटरी का नंबर लग आया।
मिल गई मुझे इकलौती धनवान पत्नी
पर उसने मुझे गुलाम है बनाया।
घर में चाकरी सबकी करता हूं
जी भर के गालियां सुनता हूं।
सबकी आवभगत करने को सबने मुझे दरबान सा ही बनाया।
ऊंचे घर का घर जंवाई बनकर ऊंची दुकान और फीके पकवान का मतलब अब मुझे समझ में है आया।

मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा

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