
फिर किसी की हवस ने, ये काम किया।
किसी की जिंदगी का काम तमाम किया।।
अय्याशियों के गलियारे में, मिट गया वो।
मानवता को देखो, फिर बदनाम किया ।।
फिर किसी कुन्ती ने ,जन्मा कर्ण को ।
कर्ण की सांसों को, फिर जाम किया।।
खींच रहे थे कुत्ते , उस नवजात को।
देखा तो सांसों को , कैसे थाम दिया।।
आ गया कानून मगर, मुजरिम नहीं मिला।
देखा जिसने भी बस, राम – राम किया ।।
वो आया भी और देखा नहीं, कुछ भी उसने।
मां शब्द की पवित्रता को, यूं निलाम किया ।।
मां ही डस गई ,अपने जिस्म के हिस्से को।
बेरहम ने एक फूल का, कत्लेआम किया ।।
माफ़ मत करना, ए – खुदा गर देखता है तू।
जिसने भी यूं रिश्तों का, खून आम किया ।।
लोग मांगते हैं प्रेम में, निशानी प्यार की।
फिर क्यूं हैवानियत को, यूं ऐसे अंजाम दिया।।
सोचता हूं तन्हाई में ‘सागर’ मैं अक्सर बैठकर।
प्यार की इस उपज को, क्यूं ऐसे बेनाम किया??
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मूल रचनाकार-
जनकवि बेख़ौफ़ शायर डा.नरेश ‘सागर’
गोल्डन बुक आफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में नाम दर्ज

