
दिन बदले तारीखें बदली, बदल नहीं इंसान सका,
कहाँ जा रही है मानवता, नहीं भेद यह जान सका।
बैर मनुज का वही मनुज से, मुझे नजर फिर आया है,
डाह द्वेष ईर्ष्या का अवगुण, मानव हृदय समाया है,
गिरा गर्त में अहंकार के, कर नहीं वह उत्थान सका,
दिन बदले तारीखें बदली, बदल नहीं इंसान सका।
अंतरिक्ष मे जिधर भी देखा, बारूद का गुब्बार दिखा,
सबके मन विस्तार लालसा, नहीं तृप्ति का भाव दिखा,
अन्याय सभी को रास आ रहा, कर न कोई व्युत्थान सका,
दिन बदले तारीखें बदली, बदल नहीं इंसान सका।
नारी नुचती दिखी है फिर से, गलियों मे चौबारों में,
दर्दभरी खबरें छपती हैं, नित्य कई अख़बारों में,
अपमानित करता वामा को, दे न कभी जो मान सका,
दिन बदले तारीखें बदली, बदल नहीं इंसान सका।
साम दाम और दंड भेद से, भौतिक सुख बस मिल जाए,
अय्याशी ऐश्वर्य रसों मे, यह जीवन बस कट जाये।
चाहत सबकी ऐसी दिखती, कोई ना तृष्णा सका,
दिन बदले तारीखें बदली, बदल नहीं इंसान सका।
✍️ नरेश चन्द्र उनियाल,
“कमली कुंज”
देहरादून, उत्तराखण्ड।




