साहित्य

एक स्त्री घर में

जयचन्द प्रजापति जय

एक स्त्री घर में
जो खुश दिखाई दे रही है

जो हंस रही है
यह सब पुरुष के लिये
एक अभिनय है

अभिनय नहीं करेगी
जलालत सहना पड़ेगा

सरे बाजार में
वस्त्र खींचे जायेंगे

पुरुष को खुश करने के लिये
सजना, संवरना पड़ता है

तह पर तह रखकर
यह जिंदगी आह भर रही है

बहुत मुश्किल से
खुली हवा ले रही है
……

जयचन्द प्रजापति जय
प्रयागराज

कविता का भावार्थ….

यह कविता जयचन्द प्रजापति द्वारा रचित एक मार्मिक रचना है, जो स्त्री के घरेलू जीवन की कठोर वास्तविकता को उजागर करती है। कवि कहते हैं कि एक स्त्री घर में खुश दिखाई देती है, हँसती-बोलती है, लेकिन यह सब पुरुष को प्रसन्न करने के लिए मात्र अभिनय है। यदि वह यह नाटक न करे, तो उसे अपमान सहना पड़ेगा—यहाँ तक कि सार्वजनिक रूप से वस्त्र खींचे जाने जैसी कलंकपूर्ण स्थिति का सामना करना पड़ सकता है। पुरुष की प्रसन्नता हेतु स्त्री को सजना-संवरना पड़ता है, जबकि उसकी जिंदगी तह-तह करके दबी हुई है, जैसे कोई आहत प्राणी बहुत कठिनाई से साँस ले रहा हो।

कुल मिलाकर, कविता पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री की दासता, जबरन थोपी गई भूमिका और आंतरिक पीड़ा को तीखे व्यंग्य से चित्रित करती है, जहाँ बाहरी सौंदर्य और हँसी के पीछे गहरी निराशा छिपी रहती है।

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