
महाराष्ट्र की पावन धरती पर, जन्मा एक उज्ज्वल भोर,
तीन जनवरी अठारह सौ इकतीस, इतिहास हुआ मुखर शोर।
सावित्री नाम नहीं केवल था, था युग परिवर्तन का घोष,
नारी चेतना की पहली किरण, अज्ञान तमस पर प्रखर रोष।
खंडोजी–लक्ष्मी की संस्कारी बेटी, सरल किन्तु अडिग विचार,
बाल्यावस्था में ही पहचान लिया, शिक्षा है जीवन का सार।
ज्योतिराव फुले संग चलकर, रचा समता का नव अध्याय,
स्त्री, दलित, वंचित सबके हित, खोले विद्या के द्वार।
काँटों भरे पथ पर चलती रही, पत्थर, तिरस्कार सहे,
पर ज्ञान की ज्योति हाथों में, हर अंधड़ से वह लड़े।
पहली शिक्षिका बनकर उसने, इतिहास रचा अपार,
विद्यालयों की स्थापना कर, बदली समाज की धार।
कुप्रथाओं पर किया प्रहार, बाल विवाह को दी चुनौती,
नारी को दी आत्मसम्मान की, अक्षय साहस की पूँजी।
केवल शिक्षा ही नहीं सिखाई, मानवता का पाठ पढ़ाया,
करुणा, समता, न्याय का दीप, हर मन में उसने जलाया।
आज भी उनके पदचिह्नों पर, चलता नव भारत का स्वप्न,
सावित्रीबाई फुले का जीवन, है संघर्षों का पावन यज्ञ।
नमन उन्हें जो युगद्रष्टा थीं, नारी मुक्ति की पहचान,
उनकी अमर विरासत से ही, होगा भारत का उत्थान।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार




