
रीलों ने मर्यादाओं के , सारे बंधन तोड़ दिये।
फूहड़ता की नंगनाच ने,हाथ शर्म से जोड़ लिये।।
अनुसूया सीता सावित्री,धर्मग्रंथ को कौन पढ़े –
कोठों ने धर नया कलेवर,पट गरिमा के छोड़ दिये।।
तैर रहीं अनगिनत तरुणियां,यौवन की गहराई में।
सिसक रही सभ्यता संस्कृति,मूल्यों की भरपाई में।।
अधमाधम नरनारि हो रहे बच्चों को समझाये कौन?
अब कोयल की पूँछ कहाँ पर,बागों की अमराई में।।
पुरखे जिस लज्जा में जीये,वही बिक रही रीलों में।
मर्यादा मर रही डूब कर,ताल तलैया झीलों में।।
वृद्ध पिता माता रोते हैं,वृद्धाश्रम की चौखट पर –
कौन कह रहा नोंक नुकीली,दिखती केवल कीलों में।।
पढ़ेलिखे अनपढ़ गंवार सब,रह रहकर इतराते हैं।
मटक मटककर भांति भांति से रीलें खूब बनाते हैं।।
अनुसूया की शिक्षा बेघर,सूपनखा के जलवे हैं –
अखबारों के पन्नों में भी,ये निहंग छा जाते हैं।।
– डॉ.उदयराज मिश्र



