
नेह प्रकृति जबअद्वत दिखती।
भरता अंतस वियोग वेदना।
गरविस्मरण हुए निज पहचान,
शून्य और हो स्वभाव चेतना।
छवि निहार सुखद संवेदना।
नयनों रहते नित स्वपन वास।
कान्हा अब तो आ जाओ पास।।
हृद विश्रांति जब गहन सन्नाटा।
दीप जले जब मंद- मंद तब।
यामिनी स्वप्न उल्लास भरे,
जीवन रेख प्रिय दर्श उमंग।
करती प्रतीक्षा वृहत स्वरूप।
अंतस भरता शुभिता उजास।
कान्हा अब तो आ जाओ पास।।
अविचल मन भटके जब जग में।
भाव भरे रहते कब मन में।
काया माया में फस जाती।
आत्म बोध तब कर न पाती।
सारे सौन्दर्य शृंगार अधूरे,
कंगन बजते दुखद एहसास।
कान्हा अब तो आ जाओ पास।।
करती प्रतीक्षा अंतस रहती।
सदा कामना मंगल करती।
अतः करण निर्झर मन होता,
सखा मिलन की आस जगाती।
प्रीत मीत से भाव लगन की।
मन भरता रहता जब उल्लास।
कान्हा अब तो आ जाओ पास।।
डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण
छतरपुर मध्यप्रदेश




