साहित्य

गीत

अवधेश विद्यार्थी

कल अचानक परी मुझे मेरी मिली,
मेरा बेढंगी सा जीवन भी ढंग हो गया।
उसने नैनों से कहा, मैंने उत्तर दिया,
देखते ही गुलाबी-सा रंग हो गया।।

नैना हल्के से उसके कुछ गीले हुए,
होंठ मेरे भी ज़रा-से कपने लगे,
मौन अधरों की भाषा में सब कुछ कहा,
लफ़्ज़ मेरे भी वहीं आकर थकने लगे।
कहा कुछ भी नहीं, बहुत कुछ कह दिया,
मेरा शब्दों से ही सारा मोह भंग हो गया।।

कल अचानक परी मुझे मेरी मिली,
मेरा बेढंगी सा जीवन भी ढंग हो गया॥

चलते-चलते हाल उसने पूछा मेरा,
उसने बरसात की, मैं भी भीगा पूरा,
बिन बोले ही सब कुछ बयां कर दिया,
ख़्वाब खस्ता थे, पर मन था अधूरा।
तुम जो मिलीं तो मंज़िल भी मिल गई,
तब से मन और बदन मगन हो गया।

कल अचानक परी मुझे मेरी मिली,
मेरा बेढंगी सा जीवन भी ढंग हो गया॥
उसने नैनों से कहा, मैंने उत्तर दिया,
देखते ही गुलाबी-सा रंग हो गया।।
✍️अवधेश विद्यार्थी

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!